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Ranchi : झारखंड की पहाड़ियों और जंगलों के बीच रहने वाली जिन महिलाओं की जिंदगी कभी सीमित संसाधनों और संघर्षों में सिमटी थी, आज वही महिलाएं वैश्विक मंच पर राज्य की पहचान बन रही हैं। विश्व आर्थिक सम्मेलन 2026 में पहली बार झारखंड की मौजूदगी सिर्फ निवेश और उद्योग की बात नहीं करेगी, बल्कि उन करोड़ों महिलाओं की कहानी सुनाएगी, जिन्होंने हाल के वर्षों में अपनी मेहनत और आत्मविश्वास से हालात बदले हैं।
दावोस में यह कहानी झारखंड की बेटी और विधायक कल्पना सोरेन दुनिया को सुनाएंगी। वे बताएंगी कि जब महिलाओं को आगे बढ़ने का मौका मिलता है, तो केवल परिवार ही नहीं, पूरा समाज मजबूत होता है।
गांव की चौखट से वैश्विक मंच तक
झारखंड के दूरदराज गांवों में रहने वाली महिलाएं कभी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर थीं। आज स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर वही महिलाएं बैंक से ऋण ले रही हैं, छोटे कारोबार चला रही हैं और अपने बच्चों के भविष्य के फैसले खुद कर रही हैं। राज्य आजीविका संवर्धन समिति से जुड़ी 35 लाख से अधिक महिलाएं इस बदलाव की जीवित मिसाल हैं। इन समूहों को मिले हजारों करोड़ रुपये के ऋण ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की राह खोली है।
योजनाएं जो जिंदगी बदल रहीं हैं
लखपति दीदी, पलाश, जोहार और आजीविका कैफे जैसी योजनाएं सिर्फ सरकारी नाम नहीं रहीं, बल्कि कई घरों की आमदनी का सहारा बन चुकी हैं। गांव की महिलाएं अब खेती के साथ साथ प्रसंस्करण, हस्तशिल्प और छोटे उद्योगों से जुड़ रही हैं। पलाश ब्रांड के उत्पाद जब देश और विदेश के बाजारों में पहुंचते हैं, तो उनके पीछे किसी आदिवासी महिला की मेहनत और सपनों की कहानी छिपी होती है।
महिला सशक्तिकरण का बदला नजरिया
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झारखंड सरकार का जोर इस बात पर रहा है कि महिला सशक्तिकरण केवल मंचों पर भाषण तक सीमित न रहे। मंईयाँ सम्मान योजना के तहत हर साल मिलने वाली सम्मान राशि ने लाखों महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा का भरोसा दिया है। इससे महिलाएं अपने बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और छोटे निवेश जैसे फैसले खुद ले पा रही हैं।
दावोस में झारखंड की असली पहचान
दावोस के मंच से कल्पना सोरेन महिला नेतृत्व, लैंगिक समानता और समावेशी विकास पर झारखंड का अनुभव साझा करेंगी। वे बताएंगी कि आदिवासी और ग्रामीण महिलाएं अब राज्य के आर्थिक और सामाजिक बदलाव की धुरी बन चुकी हैं। यह संदेश भी जाएगा कि विकास तभी टिकाऊ होता है, जब समाज की आधी आबादी उसमें बराबर की भागीदार हो।
यूके में शिक्षा और भविष्य की तैयारी
दावोस के बाद यूनाइटेड किंगडम में होने वाली बैठकों में शिक्षा, कौशल विकास और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों पर चर्चा होगी। मरांग गोमके स्कॉलरशिप के तहत पढ़ रहे झारखंड के युवाओं से मुलाकात इस बात का संकेत है कि राज्य आने वाली पीढ़ी को वैश्विक स्तर के अवसरों से जोड़ना चाहता है।
उम्मीद और भरोसे की कहानी
झारखंड की महिलाएं आज सिर्फ अपने घर की नहीं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल रही हैं। दावोस में जब उनकी मेहनत और संघर्ष की कहानी सुनाई जाएगी, तो यह केवल एक राज्य की उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि यह साबित करेगा कि सही अवसर और विश्वास मिलने पर गांव की चौखट से निकलकर दुनिया का मंच भी दूर नहीं होता।
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