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Home » स्कूल छूटा, खेल छूटा, ‘अपनों’ के चलते बचपन छूटा… फिर हुई डालसा की एंट्री
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स्कूल छूटा, खेल छूटा, ‘अपनों’ के चलते बचपन छूटा… फिर हुई डालसा की एंट्री

February 24, 2026No Comments3 Mins Read
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डालसा
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Ranchi : उम्र महज आठ साल। हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, लेकिन उनमें जमे थे साबुन के झाग। कंधे पर स्कूल बैग की जगह था काम का बोझ। और आंखों में सपनों की जगह डर। कांटाटोली के खादगढ़ा बस स्टैंड की भीड़ में पूजा होटल के कोने में खड़ा वह बच्चा चुपचाप बर्तन धो रहा था। आंखों से आंसू बह रहे थे। लोग आते-जाते रहे, चाय पीते रहे, प्लेटें बदलती रहीं। लेकिन किसी ने यह नहीं देखा कि उस छोटे से चेहरे पर बचपन की जगह थकान लिखी हुई थी।

“मुझे घर जाना है…”

पैन इंडिया बाल और किशोर मजदूरी उन्मूलन अभियान के तहत डालसा की टीम बस स्टैंड परिसर में जागरूकता कार्यक्रम चला रही थी। अचानक डालसा सचिव राकेश रौशन की नजर उस रोते हुए बच्चे पर पड़ी, तो वे उसके पास पहुंचे। पहले तो वह सहमा रहा, फिर धीरे-धीरे बोला, “मुझे घर जाना है साहेब।”

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बातचीत में उसने बताया कि वह गिरिडीह का रहने वाला है। कुछ दिन पहले उसका एक करीबी रिश्तेदार उसे रांची लेकर आया। कहा गया था कि काम सीख लेगा, पैसे कमाएगा। लेकिन सच्चाई यह थी कि सुबह से रात तक बर्तन धोना, डांट सुनना और थककर एक कोने में सो जाना ही उसकी दिनचर्या बन गई थी। बदले में मिलते थे 200 रुपये रोज। स्कूल छूट चुका था, खेल छूट चुका था, और बचपन भी जैसे कहीं पीछे छूट गया था। उसने यह भी बताया कि एक और नाबालिग बच्चा भी वहीं काम कर रहा है। टीम ने तुरंत दोनों बच्चों को रेस्क्यू कर वहां से बाहर निकाला।

अपनों ने ही छीन लिया बचपन

सबसे ज्यादा चुभने वाली बात यह थी कि बच्चों को किसी अजनबी ने नहीं, बल्कि अपने ही रिश्तेदार ने मजदूरी में धकेला। गरीबी, मजबूरी या लालच, वजह चाहे जो रही हो, लेकिन इन मासूमों की दुनिया उजड़ गई थी। डालसा सचिव राकेश रौशन ने बताया कि अभियान का मकसद सिर्फ छापेमारी नहीं, बल्कि बच्चों को सुरक्षित भविष्य देना है। उन्होंने कहा कि बाल मजदूरी कानूनन अपराध है और समाज को भी इसके खिलाफ खड़ा होना होगा।

कानूनी प्रक्रिया और नई शुरुआत

यह पूरा अभियान न्यायामूर्ति सह झालसा के कार्यपालक अध्यक्ष सुजित नारायण प्रसाद के दिशा निर्देश पर चलाया गया। सदस्य सचिव कुमारी रंजना अस्थाना और न्यायायुक्त अनिल कुमार मिश्रा-1 के मार्गदर्शन एवं डालसा सचिव राकेश रौशन की देखरेख में टीम लगातार ऐसे इलाकों में निगरानी रख रही है जहां बच्चों से काम लिए जाने की आशंका रहती है। रेस्क्यू के बाद दोनों बच्चों को चाइल्ड हेल्पलाइन के जरिये बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश किया गया। उस आठ साल के बच्चे की आंखों में अब डर कम और उम्मीद ज्यादा थी। शायद उसे भी अब यकीन होने लगा है कि जिंदगी सिर्फ बर्तन मांजने के लिए नहीं होती। संबंधित थाना को प्राथमिकी के लिए आवेदन भेजा गया है। अब आगे की कानूनी कार्रवाई होगी और बच्चों के पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

भीड़ के बीच एक सीख

खादगढ़ा बस स्टैंड पर आज सिर्फ दो बच्चों को नहीं बचाया गया, बल्कि यह याद दिलाया गया कि बाल मजदूरी अभी भी हमारे आसपास है। कई बार हम देखते हैं, लेकिन नजरअंदाज कर देते हैं। डालसा सचिव ने अपील की है कि अगर कहीं भी कोई बच्चा मजदूरी करता दिखे, तो तुरंत सूचना दें। एक फोन कॉल, एक सूचना, किसी बच्चे को फिर से स्कूल, खेल और मुस्कुराहट लौटा सकती है।

इसे भी पढ़ें : एक विक्षिप्त की खामोश पीड़ा और डालसा की इंसानियत… जानें

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