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Patna (Nilabh Krishna) : बिहार का नाम एक समय आते ही लोगों के मन में अपराध, अपहरण और अराजकता की तस्वीर उभर आती थी। 90 का दशक और उसके बाद का आधा दशक “जंगलराज” का पर्याय बन गया था। हत्या, अपहरण और डकैती रोज़मर्रा की खबरें थीं। अपहरण उद्योग ने डॉक्टरों, शिक्षकों और व्यापारियों तक को निशाना बनाया। भ्रष्टाचार इतना गहरा था कि बिना रिश्वत किसी का काम नहीं होता था। यह वह दौर था जब लालू प्रसाद यादव की राजनीति केवल जातीय समीकरणों तक सीमित रह गई और बिहार विकास की दौड़ से पूरी तरह बाहर हो गया। 2005 में नीतीश कुमार सत्ता में आए और बिहार की कहानी ने करवट ली। उन्होंने साबित किया कि सत्ता केवल जातीय नारेबाज़ी के लिए नहीं, बल्कि जनकल्याण और सुशासन के लिए होती है।
कानून-व्यवस्था : भय से विश्वास की ओर
नीतीश कुमार का सबसे बड़ा योगदान कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाना था। आंकड़े गवाही देते हैं कि 2004-05 में बिहार में हत्या के 4,500 से अधिक मामले दर्ज होते थे, जो 2015 तक घटकर 2,800 रह गए। अपहरण की घटनाओं में भी आधे से अधिक की कमी आई। यह वही बिहार है जिसे लोग कभी अपराधियों के ठिकाने के रूप में जानते थे। आज हालात ऐसे हैं कि परिवार सुकून से सफर कर सकते हैं।
सड़क और बिजली : विकास का इंजन
लालू शासन के समय लोग मज़ाक उड़ाते थे- “बिहार की सड़क पर चलना यानी मौत को न्योता देना।” गड्ढों से भरी सड़कें बरसात में दलदल बन जाती थीं। नीतीश कुमार ने सड़क निर्माण को प्राथमिकता दी। 2005 के बाद से अब तक लाखों किलोमीटर ग्रामीण सड़कें बनीं और 90% से अधिक गांव पक्की सड़कों से जुड़ गए।
बिजली की हालत और भी बदतर थी। 2005 में ग्रामीण इलाकों में मुश्किल से 2-3 घंटे बिजली मिलती थी। नीतीश कुमार ने बिजली वितरण और उत्पादन व्यवस्था सुधार दी। प्रति व्यक्ति खपत 70 यूनिट से बढ़कर 280 यूनिट हो गई। आज गांवों में भी 18-20 घंटे बिजली मिलना आम बात है।
शिक्षा : लड़कियों की क्रांति
नीतीश कुमार ने शिक्षा पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया। साइकिल योजना और पोशाक योजना ने बेटियों को स्कूल पहुंचाया। 2005 में जहां लड़कियों का नामांकन केवल 37% था, वहीं 2019 तक यह 52% पहुंच गया। आज इंटरमीडिएट तक लड़कियों की संख्या लड़कों से ज़्यादा है। यह केवल शिक्षा नहीं, सामाजिक क्रांति है जिसने बिहार की तस्वीर बदल दी।
महिला सशक्तिकरण : राजनीति में आधी आबादी
नीतीश कुमार ने पंचायतों में महिलाओं को 50% आरक्षण दिया। यह कदम ऐतिहासिक साबित हुआ। अब गांव-गांव में महिला मुखिया और पार्षद नज़र आती हैं। लालू यादव ने “सामाजिक न्याय” का नारा दिया था, पर नीतीश कुमार ने उसे जमीनी सच्चाई में बदला। यह असली सामाजिक न्याय है।
स्वास्थ्य और शराबबंदी : आम आदमी तक बदलाव
स्वास्थ्य ढांचे में सुधार लाना नीतीश की दूसरी बड़ी प्राथमिकता थी। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को सक्रिय किया गया, डॉक्टरों की उपस्थिति सुनिश्चित हुई और दवाओं की उपलब्धता बढ़ी। 2005 में मातृ मृत्यु दर 312 प्रति एक लाख जीवित जन्म थी, जो 2019 तक घटकर 149 रह गई।
2016 में लागू की गई शराबबंदी साहसिक निर्णय था। भले ही विपक्ष इसे विफल बताता रहा हो, लेकिन गांव-गांव की महिलाएं इसकी सबसे बड़ी समर्थक बनीं। घरों की बचत बढ़ी और घरेलू हिंसा के मामलों में कमी आई।
लालू बनाम नीतीश : दो मॉडल, दो नतीजे
लालू यादव का मॉडल जातिवाद और अपराध की राजनीति था, जिसने बिहार को बदनाम किया। वहीं नीतीश कुमार का मॉडल सुशासन, विकास और सामाजिक संतुलन पर आधारित रहा। लालू राज में लोग बिहार छोड़कर भागते थे। नीतिश के दौर में लौटने की सोचने लगे।
नीतीश कुमार ने बदल डाली बिहार की पहचान
नीतीश कुमार ने अपने दो दशकों के शासन से बिहार की पहचान ही बदल डाली। अपराध दर में गिरावट, सड़क और बिजली की क्रांति, शिक्षा में बेटियों की बढ़ती भागीदारी, महिला सशक्तिकरण, बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था और शराबबंदी जैसे साहसिक फैसले उनके खाते में हैं। बिहार आज भी चुनौतियों से जूझ रहा है, लेकिन नीतीश कुमार ने उस अंधकारमय “जंगलराज” से निकालकर राज्य को आशा और विश्वास दिया। यही कारण है कि उन्हें बिहार का उद्धारक कहा जाता है। वे अब भी इस पद के सबसे उपयुक्त नेता हैं, क्योंकि वे बिहार की नब्ज़ को समझते हैं और जानते हैं कि इस राज्य को पिछड़ेपन से उठाकर सुशासन और विकास की राह पर कैसे बनाए रखना है।
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