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Pakur (Jaydev Kumar) : आम तौर पर सावन-भादों में किसान खेतों की मेड़ों पर पसीना बहाते नजर आते हैं, लेकिन पाकुड़ के अमड़ापाड़ा मुख्य बाजार का नजारा कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहा था। यहां हाथ में धान के बिचड़े लिए दर्जनों ग्रामीण किसी लहलहाते खेत में नहीं, बल्कि इलाके की सबसे व्यस्त अमड़ापाड़ा-दुमका मुख्य सड़क पर खड़े थे। सड़क के नाम पर बची गिट्टियां, घुटनों तक भरा मटमैला पानी और बड़े-बड़े गड्ढे किसी जलमग्न खेत से कम नहीं लग रहे थे। बरसों से जर्जर सड़क का दंश झेल रहे ग्रामीणों के सब्र का बांध जब टूटा, तो उन्होंने हाथ में धान के पौधे थामे और बीच सड़क पर रोपनी शुरू कर दी। यह सिर्फ एक सांकेतिक विरोध नहीं था, बल्कि विकास के उन दावों पर सीधा तंज था जो फाइलों से निकलकर जमीन तक कभी पहुंचे ही नहीं।
हिचकोलों भरा सफर और हर पल हादसे का साया
अमड़ापाड़ा मुख्य बाजार से गुजरने वाला यह रास्ता दो बड़े जिलों को जोड़ने वाली मुख्य कड़ी है। रोजाना सैकड़ों छोटी-बड़ी गाड़ियां, स्कूली बसें और एंबुलेंस यहां से गुजरती हैं, लेकिन सफर किसी दुःस्वप्न से कम नहीं होता। बारिश होते ही सड़क पर बने गड्ढे पानी से लबालब भर जाते हैं। राहगीरों को यह अंदाजा ही नहीं लग पाता कि पहिया सड़क पर है या किसी जानलेवा गड्ढे में समाने जा रहा है। आए दिन बाइक सवार यहां फिसलकर गिरते हैं, बुजुर्गों की कमर का दर्द बढ़ जाता है और ऑटो रिक्शा पलटते-पलटते बचते हैं। स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि जब धूप निकलती है तो धूल का गुबार सांस लेना दूभर कर देता है और बारिश होते ही दुकान के सामने कीचड़ का दलदल पसर जाता है।
नेताओं के वादे सूखे, गड्ढों में भरा पानी
सड़क पर धान रोप रहे युवाओं और बुजुर्गों के चेहरों पर बरसों की उपेक्षा का गुस्सा साफ झलक रहा था। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव चाहे लोकसभा का हो या विधानसभा का, हर बार नेता आते हैं और चमचमाती सड़क का ख्वाब दिखाकर वोट ले जाते हैं। सांसद से लेकर विधायक और जिला प्रशासन के दफ्तरों तक दर्जनों बार गुहार लगाई गई, मांग पत्र सौंपे गए, मगर हाथ लगी तो सिर्फ तारीख और कोरे आश्वासन। ग्रामीणों ने तंज कसते हुए कहा कि जब हुक्मरानों को इस सड़क पर चलने लायक रास्ता नजर नहीं आ रहा, तो हमने सोचा कि पानी और कीचड़ का सही इस्तेमाल ही कर लिया जाए, कम से कम कुछ अनाज ही पैदा हो जाएगा।
तीन घंटे थमे रहे पहिए, पूरे जिले में यही हाल
इस अनोखे विरोध प्रदर्शन की वजह से देखते ही देखते सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। करीब तीन घंटे तक अमड़ापाड़ा-दुमका मार्ग पर पूरी तरह चक्का जाम रहा। सफर में फंसे बस यात्री और ट्रक चालक भी परेशान जरूर हुए, मगर वे भी दबी जुबान में ग्रामीणों के गुस्से को जायज ठहराते दिखे। वैसे, बदहाली की यह तस्वीर सिर्फ अमड़ापाड़ा की नहीं है। पाकुड़-हिरणपुर मुख्य मार्ग समेत जिले के कई अंदरूनी और प्रमुख रास्ते बारिश के बाद बदहाली के आंसू रो रहे हैं। ग्रामीणों ने अब साफ कर दिया है कि अगर प्रशासन ने जल्द ही इन गड्ढों को भरकर पक्की सड़क का निर्माण शुरू नहीं कराया, तो अगली बार यह गुस्सा किसी बड़े जनआंदोलन की शक्ल में सड़कों पर उतरेगा।
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