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New Delhi : कभी घर में हंसी-खुशी से भरा रहने वाला एक परिवार पिछले 12 साल से एक ऐसी लड़ाई लड़ रहा था, जिसमें उम्मीद धीरे-धीरे खत्म होती चली गई। 31 साल का हरीश राणा पिछले एक दशक से ज्यादा समय से बिस्तर पर है। शरीर ने जवाब दे दिया है और जिंदगी मशीनों के सहारे चल रही है। बुधवार को इस लंबे इंतजार का अंत हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी। यह फैसला कानूनी से ज्यादा मानवीय है, क्योंकि इसके पीछे एक ऐसे परिवार की पीड़ा छिपी है जो सालों से अपने बेटे को तड़पते हुए देख रहा था।
रक्षाबंधन का दिन और जिंदगी का सबसे बड़ा हादसा
साल 2013 का रक्षाबंधन। घर में त्योहार का माहौल था। उसी दिन एक हादसे ने हरीश और उसके परिवार की पूरी दुनिया बदल दी। हरीश अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गया। गिरने के बाद उसके सिर और कमर में गंभीर चोटें आईं। शुरुआत में परिवार को लगा कि इलाज से सब ठीक हो जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे सच सामने आने लगा। डॉक्टरों ने बताया कि हरीश क्वाड्रिप्लेजिया का शिकार हो गया है। यानी शरीर के चारों हिस्से लगभग काम करना बंद कर चुके हैं। कुछ ही समय में वह पूरी तरह बिस्तर पर आ गया।

उम्मीद के सहारे कटते रहे साल
मां-बाप के लिए उम्मीद छोड़ना आसान नहीं होता। हरीश के पिता अशोक राणा भी हर दिन इसी उम्मीद के साथ जीते रहे कि एक दिन बेटा जरूर ठीक होगा। इसी उम्मीद में उन्होंने बेटे का इलाज देश के बड़े-बड़े अस्पतालों में कराया। पीजीआई चंडीगढ़, एम्स दिल्ली, राम मनोहर लोहिया अस्पताल, एलएनजेपी अस्पताल और अपोलो अस्पताल जैसे अस्पतालों के चक्कर लगाए गए। लेकिन हर बार डॉक्टरों की बात लगभग एक जैसी होती थी। हालत बहुत गंभीर है और सुधार की उम्मीद बहुत कम।
बेटे के इलाज में बिक गया घर
इलाज का खर्च धीरे-धीरे परिवार की कमर तोड़ने लगा। अशोक राणा बताते हैं कि दिल्ली के महावीर एंक्लेव में उनका तीन मंजिला मकान था। बेटे के इलाज के लिए उन्होंने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी जमा पूंजी भी बेच दी। सितंबर 2021 में वह मकान भी चला गया। अब हालत यह है कि आर्थिक रूप से परिवार लगभग खाली हो चुका है। उम्र भी बढ़ रही है और बेटे की हालत हर दिन और कमजोर होती जा रही है।
सबसे मुश्किल फैसला
अशोक राणा कहते हैं कि किसी मां-बाप के लिए अपने बच्चे के लिए मौत मांगना दुनिया का सबसे कठिन फैसला होता है। लेकिन पिछले कई सालों से बेटे को दर्द और बेबसी में देखते-देखते उन्होंने यह कदम उठाया। उन्होंने अदालत से कहा कि वह अपने बेटे को इस हालत में और नहीं देख सकते।

अदालतों तक पहुंची पीड़ा
परिवार ने पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। जुलाई 2024 में हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी। इसके बाद परिवार ने हार नहीं मानी और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान डॉक्टरों के मेडिकल बोर्ड ने हरीश की हालत की विस्तृत रिपोर्ट दी। रिपोर्ट में कहा गया कि उसके ठीक होने की संभावना लगभग नहीं है और लंबे समय तक बिस्तर पर रहने से उसे गंभीर घाव और दर्द हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, गरिमा के साथ हो प्रक्रिया
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और केवी विश्वनाथन की पीठ ने की। अदालत ने निर्देश दिया कि हरीश को एम्स दिल्ली की पैलेटिव केयर यूनिट में रखा जाए। वहां उसकी देखभाल के साथ-साथ जीवन रक्षक उपचार को धीरे-धीरे बंद करने की प्रक्रिया अपनाई जाए। अदालत ने यह भी कहा कि पूरी प्रक्रिया सम्मान और संवेदनशीलता के साथ होनी चाहिए, ताकि मरीज की गरिमा बनी रहे।
बेटे के जाने से पहले एक आखिरी इच्छा
हरीश के पिता ने अदालत में एक और बात कही जो दिल को छू लेने वाली है। उन्होंने कहा कि अगर उनके बेटे के शरीर के कुछ अंग काम कर रहे हों तो उन्हें दान कर दिया जाए। इससे किसी दूसरे मरीज को नई जिंदगी मिल सकती है।
क्या होती है निष्क्रिय इच्छामृत्यु
निष्क्रिय इच्छामृत्यु में मरीज को जानबूझकर मौत नहीं दी जाती। इसमें सिर्फ जीवन को बनाए रखने वाले उपकरण या इलाज को बंद कर दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में इसके लिए साफ दिशा-निर्देश तय किए थे। इनके अनुसार ऐसे मामलों में डॉक्टरों के दो अलग-अलग मेडिकल बोर्ड की राय लेना जरूरी होता है।
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