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Chhattishgarh (Kanker) : कभी पुलिस पर गोलियां बरसाने वाले हाथों में आज संविधान की प्रति थी… कभी जंगल के रास्तों पर बंदूकें थामे चलने वाले कदम अब जंगल से मुख्यधारा की ओर लौट रहे थे। यह नजारा उत्तर बस्तर के जंगलवार कॉलेज परिसर का था, जहां बुधवार को 21 खूंखार नक्सली अपने हथियारों के साथ पुलिस के सामने नतमस्तक हो गये। पुलिस ने भी सरेंडर करने वाले नक्सलियों का स्वागत रेड कारपेट बिछा कर किया।
पुलिस को सौंपे 18 हथियार
पुलिस के सामने जब ये 21 माओवादी आगे बढ़े, उनके चेहरे पर एक अलग सुकून था। वे अब उस जीवन से बाहर निकलना चाहते थे, जहां सिर्फ खौफ, संदेह और हिंसा थी। कांकेर जिले की दो एरिया कमेटियों के सदस्य रहे इन नक्सलियों ने 18 हथियार पुलिस को सौंपे। बस्तर रेंज के आईजी पी. सुंदरराज ने खुद सभी को संविधान की प्रति थमाते हुए कहा… “अब बंदूक की नहीं, विकास की ताकत से बस्तर आगे बढ़ेगा।” यह सिर्फ आत्मसमर्पण नहीं था, बल्कि उस विचारधारा से आज़ादी थी जिसने दशकों तक बस्तर की मासूम जिंदगियों को दहशत में रखा था।
रणनीति बदली, तो बदला हालात का नक्शा
इस माह पुलिस ने नक्सल मोर्चे पर नई रणनीति अपनाई। अब एनकाउंटर नहीं, संवाद और सरेंडर को प्राथमिकता दी जा रही है। संदेश साफ था… जो लौटना चाहते हैं, उनका स्वागत है… जो नहीं, उनके लिए बस्तर का डीआरजी और सुरक्षाबल पूरी तैयारी में हैं। परिणाम भी अभूतपूर्व रहे… जगदलपुर में 208 नक्सलियों ने पहले ही 109 हथियारों के साथ आत्मसमर्पण किया था। और अब कांकेर में यह बड़ा सरेंडर हुआ है।
कमजोर पड़ रहा है नक्सली संगठन
आईजी सुंदरराज ने बताया, “कभी नक्सलियों की पोलित ब्यूरो और सेंट्रल कमेटी में 45 सदस्य हुआ करते थे, पर अब यह संख्या घटकर सिर्फ 6-7 तक रह गई है। यह आंकड़ा बताता है कि जंगल में नक्सली आंदोलन अब अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। सुरक्षाबलों की चौकसी और स्थानीय जनता के सहयोग से बस्तर अब नक्सलमुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।”
आत्मसमर्पण के बाद नई जिंदगी की शुरुआत
सरकार ने आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए पुनर्वास योजना शुरू की है। इन्हें रोजगार, आवास, और शिक्षा की सुविधाएं दी जाएंगी ताकि वे अपने परिवार के साथ सम्मानजनक जीवन बिता सकें। इनमें से कई ने कहा कि अब वे अपने बच्चों को स्कूल भेजना चाहते हैं, जंगल नहीं।
जंगल से उम्मीद की किरण तक
कभी बंदूक की नली से न्याय खोजने वाले अब संविधान पर विश्वास जता रहे हैं। बस्तर की धरती, जिसने वर्षों तक गोलियों की गूंज सुनी थी, अब संवाद, विकास और भरोसे की नई सुबह देख रही है। ये 21 नक्सली उस बदलाव की मिसाल बन गए हैं, जो बताता है… “जहां चाह, वहां राह… और जब दिल बदले, तो इतिहास भी।”
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