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Ranchi : विनायक इको रिसॉर्ट, ओरमांझी की ठंडी हवा में जब डॉक्टरों ने नवजातों की नन्हीं जिंदगी की बात की, तो माहौल मानो एक चिकित्सा सम्मेलन नहीं, बल्कि संवेदनाओं का संगम बन गया। शनिवार को IAP यानी इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक रांची की ओर से आयोजित 24वां झारखंड पेडिकॉन सिर्फ एक मेडिकल इवेंट नहीं रहा, बल्कि हर उस बच्चे की कहानी बन गया जो जन्म के बाद पहली सांस लेने के लिए संघर्ष करता है।
जब डॉक्टरों ने कहा… हर मिनट मायने रखता है
सम्मेलन के दौरान डॉ राजेश कुमार (बालपन) की आवाज में झलकती चिंता ने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने बताया कि हर 1000 बच्चों में से 14 की मौत जन्म के बाद हो जाती है। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, हर परिवार की अधूरी मुस्कान है। उन्होंने कहा कि बच्चे को जन्म के तुरंत बाद गर्म रखना, नाभि को साफ करना, और मां का पहला दूध देना… ये तीन बातें अगर हर जगह अपनाई जाएं, तो हजारों जिंदगियां बचाई जा सकती हैं। उनकी बातों से लगा कि चिकित्सा विज्ञान सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि करुणा का नाम भी है।
तकनीक ने बदला इलाज का चेहरा
डॉ कृष्ण कुमार ने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया, “पहले दवाएं पीसकर दी जाती थीं, अब नवजात को वेंटिलेशन तकनीक से जीवनदान दिया जा रहा है।” उन्होंने कहा कि आज हर बच्चे के लिए उम्मीद की एक नई किरण है, अगर प्रशिक्षण और साधन सही हों।
उनकी बातों में एक सुकून था, जैसे उन्होंने कई ऐसे नन्हे मरीजों को फिर से सांसें दी हों जिनके माता-पिता ने उम्मीद छोड़ दी थी।
एआई भी सीखता है इंसानियत की भाषा
डॉ श्याम सुंदर सिडाना ने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब चिकित्सा की दुनिया में कदम रख चुका है। लेकिन उन्होंने चेताया, “एआई कितना भी स्मार्ट हो, इंसान की समझ और संवेदना का कोई विकल्प नहीं।” उन्होंने कहा कि मशीनें रिपोर्ट दे सकती हैं, लेकिन डॉक्टर ही तय करते हैं कि किस बच्चे को कैसे बचाना है।
संक्रमण से लड़ाई और गलत दवाओं से बचाव
हैदराबाद की डॉ अपर्णा ने बेहद संवेदनशील मुद्दा उठाया… नवजातों में संक्रमण और एंटीबायोटिक का गलत उपयोग। उन्होंने बताया कि कई बार डर में हम ऐसी दवाएं दे देते हैं जिनकी जरूरत नहीं होती, और इससे बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ जाती है।
उनकी बात सुनकर कई डॉक्टरों ने सिर हिलाकर सहमति जताई, क्योंकि यह गलती आम है, लेकिन असर गहरा।
एक उम्मीद, कई चेहरे
डॉ अभिषेक रंजन ने थैलेसीमिया पर बात की, डॉ केएस दास ने संक्रमण पर, और डॉ अभिषेक झा ने नवजात कैंसर के आपातकालीन इलाज पर जानकारी दी। सभी का एक ही मकसद था… हर उस बच्चे की जिंदगी को बचाना जो अपनी पहली चीख के साथ जीवन से जंग लड़ता है।
सम्मेलन में डॉ राजीव मिश्रा, डॉ शैलेश, डॉ अनिताभ कुमार, डॉ रतन कुमार, डॉ निशांत पाठक, डॉ हेमंत और डॉ अजीत सहाय सहित देशभर से आए बाल रोग विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। हर चेहरे पर एक ही भावना थी… जब तक एक भी शिशु असुरक्षित है, हमारा काम अधूरा है।
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