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Hazaribagh : हजारीबाग के बड़कागांव के घने जंगलों में बीते रविवार की दोपहर कुछ हलचल थी। स्थानीय लोगों ने बताया… चार-पांच अजनबी चेहरे दिखे थे, हथियार नहीं दिखे लेकिन चाल-ढाल कुछ अलग थी। पुलिस कप्तान अंजनी अंजन को जैसे ही यह सूचना मिली, उन्होंने तुरंत टीम रवाना की। रात तक ऑपरेशन चला। पुलिस की घेराबंदी के बीच, एक व्यक्ति झोला थामे भागने की कोशिश कर रहा था… और वहीं कहानी पलट गई।
जो पकड़ा गया, वह कोई आम आदमी नहीं था…
जब पुलिस ने उसे रोका और नाम पूछा, तो जवाब सुनकर सभी स्तब्ध रह गए… “मेरा नाम सुनील गंझू है…” वही सुनील गंझू जिसका नाम सुनते ही कभी चतरा और हजारीबाग के ग्रामीण कांप उठते थे। वही माओवादी, जिस पर 54 संगीन आपराधिक मामले दर्ज हैं। वही चेहरा, जिसने 2001 के बेलतू नरसंहार में 13 निर्दोष लोगों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया था।
1990 से नक्सल आंदोलन का चेहरा, 2018 में फिर लौटा जंगलों में
पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि सुनील गंझू 1990 से भाकपा (माओवादी) संगठन में सक्रिय था। कई बार जेल गया, पर हर बार जेल से निकलने के बाद और ज़्यादा खतरनाक होकर लौटा। 2018 में जेल से रिहा होने के बाद उसने फिर से संगठन से संपर्क जोड़ा।
इस बार उसका काम था… उत्तरी छोटानागपुर के रीजनल कमांडर शहदेव महतो और सब-जोनल कमांडर नताशा तक रसद और मदद पहुंचाना। वह कभी खुद नहीं फायर करता था, लेकिन फायरिंग करवाता ज़रूर था।
लेवी वसूली का खेल
पकड़े जाने के बाद सुनील ने बताया कि वह अपने चार साथियों के साथ कोयला कंपनियों, ठेकेदारों और कोयला कारोबारियों से लेवी वसूलने आया था। उसके पास से नक्सली पर्चे और लेटरहेड बरामद हुए। पुलिस के अनुसार, ये सभी लोग संगठन के विस्तार और आर्थिक मजबूती के मिशन में लगे थे।
बेलतू नरसंहार… जिसने झारखंड को हिला दिया था
साल 2001, स्थान – बड़कागांव का बेलतू गांव। उस रात गांववालों ने सोचा भी नहीं था कि अगली सुबह उनके गांव का नाम इतिहास में दर्ज हो जाएगा… वह भी खून के साथ। 13 ग्रामीणों की हत्या, सिर काटे गए और बताया जाता है कि नक्सलियों ने उन कटे हुए सिरों से फुटबॉल खेला। यह वह घटना थी, जिसने पूरे झारखंड को झकझोर दिया। और उसी काले अध्याय में सुनील गंझू का नाम सबसे ऊपर लिखा गया था।
“अब जंगल से एक साया कम हुआ है”
पुलिस कप्तान अंजनी अंजन ने कहा “यह गिरफ्तारी हजारीबाग के लिए बहुत बड़ी सफलता है। सुनील गंझू की गिरफ्तारी से नक्सलियों की कमर टूटी है। जो कभी दहशत का दूसरा नाम था, वह अब सलाखों के पीछे है।”
झारखंड का टेरर, जो अब कैद में है
झारखंड पुलिस के लिए यह सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं, बल्कि एक लंबे दौर की आतंक कहानी का अंत है। जिस सुनील गंझू के नाम पर गांवों में बच्चों को डराया जाता था, आज वही पुलिस हिरासत में है। बेलतू नरसंहार के पीड़ित परिवारों के लिए यह गिरफ्तारी शायद देर से मिली न्याय की एक उम्मीद बनकर आई है।
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