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Pakur (Jaydev Kumar) : पाकुड़ जिले के लिट्टीपाड़ा प्रखंड का जीतपुर गांव। चारों तरफ हरियाली जरूर है, लेकिन यहां खेती हमेशा आसान नहीं रही। बारिश पर निर्भर खेत, सीमित संसाधन और अनिश्चित आमदनी। इन्हीं हालातों में ताजमुल अंसारी वर्षों से अपनी आधा एकड़ जमीन को देखते रहे, जो ज्यादातर समय खाली पड़ी रहती थी।
मेहनत थी, मगर साधन नहीं
ताजमुल अंसारी धान और गेहूं की खेती करना चाहते थे, लेकिन सिंचाई की सुविधा न होने से फसल हर साल जोखिम बन जाती थी। कई बार मेहनत के बाद भी जमीन से उतना नहीं मिल पाता, जिससे परिवार की जरूरतें पूरी हो सकें। परती जमीन धीरे धीरे बोझ बनती जा रही थी।
एक ग्रामसभा, जिसने सोच बदल दी
गांव की ग्रामसभा में जब पंचायत कर्मियों ने मनरेगा के तहत बिरसा हरित ग्राम योजना की जानकारी दी, तो ताजमुल को पहली बार लगा कि उनकी जमीन भी कुछ कर सकती है। योजना की प्रक्रिया समझी, आवेदन किया और वित्तीय वर्ष 2023-24 में आधा एकड़ जमीन पर आम बागवानी की स्वीकृति मिल गई।
गड्ढों से शुरू हुई नई कहानी
जमीन पर गड्ढे खुदे, खाद डाली गई और फिर एक एक कर 48 आम के पौधे रोपे गए। पौधों को बचाने के लिए चारों ओर घेराबंदी की गई। आंधी तूफान से सुरक्षा के लिए H टेका लगाया गया। साथ ही बारिश का पानी सहेजने के लिए जलकुंड भी बनाया गया।
हर सुबह बाग में उम्मीद की सिंचाई
आज ताजमुल और उनकी पत्नी रोज सुबह आम के बाग में पहुंचते हैं। पौधों को पानी देना, निराई गुड़ाई करना और घेराबंदी की मरम्मत करना अब उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। एक साल में ही सभी पौधे हरे भरे हो गए हैं, जो आने वाले समय में आमदनी का मजबूत सहारा बनेंगे।

सरकारी निगरानी, भरोसे की मजबूती
प्रखंड और जिला स्तर के अधिकारी समय समय पर बागवानी स्थल का निरीक्षण करते रहे। इससे लाभुक परिवार को भरोसा मिला कि उनकी मेहनत बेकार नहीं जाएगी और योजना सही दिशा में आगे बढ़ रही है।
परती से उत्पादक बनी जमीन
प्रखंड विकास पदाधिकारी संजय कुमार बताते हैं कि बिरसा हरित ग्राम योजना से परती जमीन का सही उपयोग संभव हो रहा है। इससे कमजोर और अल्पसंख्यक वर्ग के परिवारों को स्थायी आजीविका मिल रही है और गांवों में आत्मनिर्भरता बढ़ रही है।
अब भविष्य को लेकर है भरोसा
ताजमुल अंसारी और उनकी पत्नी कहते हैं कि पहले जमीन देखकर चिंता होती थी, अब उसी जमीन को देखकर उम्मीद जगती है। आम के ये पौधे सिर्फ पेड़ नहीं, बल्कि उनके बच्चों के बेहतर भविष्य की नींव हैं। राज्य सरकार और जिला प्रशासन के सहयोग से उन्हें अब अपनी जमीन पर फिर से भरोसा होने लगा है।
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