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News Samvad : भारत में हर साल लाखों लोग हेल्थ इंश्योरेंस खरीदते हैं। लेकिन इलाज के बाद कई बार उनका क्लेम मंजूर नहीं हो पाता। इसकी सबसे बड़ी वजह है पॉलिसी की शर्तों और अधिकारों की सही जानकारी न होना।
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता रूद्र विक्रम सिंह कहते हैं कि हेल्थ इंश्योरेंस केवल इलाज का खर्च उठाने का साधन नहीं, बल्कि यह पॉलिसीधारक का कानूनी अधिकार और सुरक्षा कवच है।
क्या कवर करता है हेल्थ इंश्योरेंस?
हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी में इलाज, अस्पताल में भर्ती, ऑपरेशन, दवाइयां, एम्बुलेंस और छोटे इलाज (डे-केयर ट्रीटमेंट) तक का खर्च शामिल हो सकता है। कई प्लान कैशलेस इलाज की सुविधा भी देते हैं।
किन हालात में क्लेम पास होगा?
इलाज या सर्जरी डॉक्टर द्वारा लिखित होनी चाहिए।
मरीज का अस्पताल में भर्ती होना जरूरी है (डे-केयर भी शामिल)।
इलाज पॉलिसी में कवर होना चाहिए।
बिल, रिपोर्ट और डिस्चार्ज समरी जैसे डॉक्यूमेंट जमा करने हों।
अस्पताल में भर्ती होते ही इंश्योरेंस कंपनी या TPA को सूचना देना जरूरी है।
क्लेम रिजेक्ट होने की वजहें
पॉलिसी में कवर न होने वाला इलाज।
अधूरे या गलत कागज जमा करना।
समय पर कंपनी को जानकारी न देना।
गलत या अधूरी जानकारी छिपाना।
शिकायत कहां करें?
अगर बिना उचित कारण क्लेम रिजेक्ट हो जाए तो—
पहले कंपनी के Grievance Cell में शिकायत करें।
फिर IRDAI की वेबसाइट पर ऑनलाइन शिकायत कर सकते हैं।
अपने क्षेत्र के इंश्योरेंस लोकपाल से संपर्क करें।
जरूरत हो तो कंज्यूमर कोर्ट जा सकते हैं।
आर्थिक रूप से कमजोर लोग NALSA/SLSA से मुफ्त कानूनी मदद ले सकते हैं।
कैशलेस और रीइंबर्समेंट क्लेम
कैशलेस क्लेम में अस्पताल का बिल सीधे इंश्योरेंस कंपनी भरती है। वहीं, रीइंबर्समेंट क्लेम में मरीज पहले खर्च करता है और बाद में सभी कागज देकर कंपनी से पैसे वापस लेता है।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि पॉलिसी खरीदते समय ध्यान रखें कि उसमें OPD खर्च (डॉक्टर की फीस, टेस्ट और दवाइयां) शामिल हैं या नहीं।
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