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Home » जब कांगला फोर्ट पर लहराया तिरंगा, इतिहास ने लोकतंत्र से हाथ मिलाया
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जब कांगला फोर्ट पर लहराया तिरंगा, इतिहास ने लोकतंत्र से हाथ मिलाया

January 22, 2026No Comments3 Mins Read
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तिरंगा
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Imphal : सुबह की हल्की धूप में जब मणिपुर के ऐतिहासिक कांगला फोर्ट में तिरंगा धीरे-धीरे ऊपर उठा, तो यह सिर्फ एक झंडा फहराने का क्षण नहीं था। यह उस भावना का दृश्य रूप था, जो एक आम भारतीय के मन में अपने देश के लिए सम्मान, गर्व और जिम्मेदारी के रूप में बसती है। सदियों से मणिपुर के राजाओं की सत्ता और मैतेई समाज की पहचान का केंद्र रहे इस किले ने बहुत कुछ देखा है। युद्ध, सत्ता परिवर्तन और इतिहास के कई मोड़। अब उसी कांगला फोर्ट में फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने देश का 200वां विशाल राष्ट्रीय ध्वज स्थापित किया। यह तिरंगा अब यहां आने वाले हर व्यक्ति को एक सवाल पूछेगा। क्या हम सिर्फ झंडा फहराने का अधिकार जानते हैं या उसके अर्थ को भी जीते हैं।

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एक अधिकार, जो आसान नहीं था

आज देश में कोई भी नागरिक अपने घर, कार्यालय या सार्वजनिक स्थान पर सम्मानपूर्वक तिरंगा फहरा सकता है। लेकिन यह अधिकार हमेशा से इतना सहज नहीं था। एक समय था जब आम नागरिकों को साल में गिने-चुने दिनों पर ही झंडा फहराने की अनुमति थी। इस बदलाव की कहानी एक व्यक्ति से जुड़ी है। फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष नवीन जिन्द्रल। अमेरिका से भारत लौटने के बाद उन्होंने महसूस किया कि जिस तिरंगे को हर भारतीय अपने दिल में रखता है, उसे रोज फहराने पर रोक क्यों हो। यही सवाल उन्हें अदालतों तक ले गया।

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अदालत से संविधान तक पहुंचा तिरंगा

करीब एक दशक तक चला कानूनी संघर्ष आसान नहीं था। लेकिन 23 जनवरी 2004 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि सम्मान के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराना संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। यह फैसला सिर्फ कानून की किताबों में दर्ज एक पंक्ति नहीं था। यह उस आम नागरिक की जीत थी, जो अपने घर की छत पर तिरंगा लगाकर खुद को देश से जुड़ा महसूस करना चाहता था।

कांगला फोर्ट और मणिपुर की पहचान

200वें विशाल ध्वज के लिए कांगला फोर्ट का चयन भी अपने आप में एक संदेश है। 21 जनवरी 1972 को मणिपुर को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला था। यह किला मणिपुर की सांस्कृतिक आत्मा माना जाता है। अब यहां लहराता तिरंगा यह बताता है कि विविध पहचानें मिलकर ही भारत बनती हैं। स्थानीय लोगों और पर्यटकों के लिए यह ध्वज सिर्फ देखने की चीज नहीं, बल्कि याद दिलाने वाला प्रतीक है कि देश की एकता अलग-अलग संस्कृतियों को सम्मान देने से ही मजबूत होती है।

अधिकार से आगे जिम्मेदारी की बात

नवीन जिन्द्रल कहते हैं कि तिरंगा आराम का नहीं, जिम्मेदारी का प्रतीक है। उनका मानना है कि हर सुबह तिरंगे को देखना हमें यह याद दिलाता है कि हमने देश के लिए क्या किया और आगे क्या करना है। इसी सोच के साथ फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया 23 जनवरी को राष्ट्रीय ध्वज दिवस घोषित करने की मांग कर रहा है। उद्देश्य साफ है। नागरिक केवल अधिकार की बात न करें, बल्कि संविधान और देश के मूल्यों को अपने जीवन में उतारें।

तिरंगा और आने वाली पीढ़ी

फाउंडेशन की पहल युवाओं से खास तौर पर जुड़ती है। तिरंगे को स्कूलों, सार्वजनिक स्थानों और ऐतिहासिक धरोहरों से जोड़कर यह संदेश दिया जा रहा है कि देशभक्ति सिर्फ भाषणों में नहीं, रोज़मर्रा के आचरण में दिखनी चाहिए। कांगला फोर्ट में लहराता यह तिरंगा आने वाली पीढ़ियों से भी बात करता है। यह कहता है कि आज़ादी सिर्फ मिली हुई चीज नहीं, बल्कि निभाई जाने वाली जिम्मेदारी है।

इसे भी पढ़ें : भोरे-भोर एनका’उंटर, गोलियों की तड़तड़ाहट से दहल उठा सारंडा जंगल

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