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Hazaribagh : टीबी सिर्फ फेफड़ों की बीमारी नहीं है, यह इंसान के हौसले और शरीर की ताकत दोनों को निचोड़ लेती है। ऐसे में समय पर मिलने वाली दवा जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है मरीज की थाली में भरपूर पोषण होना। इसी सोच के साथ बड़कागांव के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में टीबी मरीजों के चेहरों पर उम्मीद लौटाने की एक जमीनी कोशिश देखने को मिली। गोंदुलपारा खनन परियोजना के तहत अदाणी फाउंडेशन ने अपने अभियान के दूसरे चरण में यहां 80 मरीजों को खास पोषण किट सौंपी, ताकि इलाज के दौरान कमजोरी उन पर हावी न हो सके।
दवा का पक्का नियम ही बनेगा ढाल
अस्पताल परिसर में जुटी भीड़ के बीच डॉक्टरों ने मरीजों से सीधे दिल की बात की। मेडिकल ऑफिसर डॉ. अंजू प्रभा ने साफ शब्दों में समझाया कि टीबी का इलाज अधूरा छोड़ना सबसे बड़ा खतरा है। उन्होंने कहा कि अक्सर मरीज दो-तीन महीने दवा खाने के बाद खुद को ठीक महसूस करने लगते हैं और गोलियां लेना बंद कर देते हैं। यही वह मोड़ है जहां बीमारी दोबारा और ज्यादा जिद्दी होकर लौटती है। इसलिए जब तक डॉक्टर खुद न कहें, तब तक एक दिन भी दवा का नागा न करें। साथ ही सीनियर ट्रीटमेंट सुपरवाइजर दीपक कुमार ने मरीजों को समझाया कि घर में हवादार जगह पर रहें और अपनी साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखें।

थाली में ताकत होगी तभी काम करेगी गोली
कार्यक्रम के दौरान डॉक्टरों ने इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया कि टीबी की दवाएं काफी तेज होती हैं। अगर मरीज खाली पेट रहेगा या कमजोर खुराक लेगा, तो उसका शरीर दवाओं का असर झेल नहीं पाएगा। ऐसे में बांटी गई पोषण किट मरीजों की रोजाना की खुराक में प्रोटीन और जरूरी पोषक तत्वों की कमी को पूरा करेगी। संतुलित और पौष्टिक खाना मरीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता को तेजी से बढ़ाता है, जिससे शरीर बीमारी के बैक्टीरिया को मात देकर जल्दी संभलने लगता है।
अस्पताल से लेकर गांव तक मजबूत तालमेल
इस वितरण कार्यक्रम को व्यवस्थित तरीके से पूरा करने में अस्पताल के कर्मचारियों और फाउंडेशन की टीम का तालमेल दिखा। गांव-देहात से आए मरीजों की सूची बनाकर एक-एक करके सभी को किट सौंपी गई। सिर्फ डिब्बे बांटना मकसद नहीं था, बल्कि वहां मौजूद हर मरीज के मन में बीमारी को लेकर जो झिझक या डर था, बातचीत के जरिए उसे दूर करने की कोशिश की गई।
सिर्फ इलाज नहीं, जिंदगी संवारने की भी पहल
इलाके में चल रही कोशिशें सिर्फ अस्पताल के कमरों तक सीमित नहीं हैं। बड़कागांव और आसपास के गांवों में लोगों की जिंदगी को पटरी पर लाने के लिए बुनियादी स्तर पर भी काम हो रहा है। युवाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए हुनर सिखाया जा रहा है, ताकि उन्हें रोजगार के लिए भटकना न पड़े। वहीं सरकारी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का माहौल सुधारने, महिलाओं को छोटे-मोटे कामों से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाने और गांवों में जरूरी सुविधाएं पहुंचाने पर भी लगातार ध्यान दिया जा रहा है, ताकि सेहत के साथ-साथ इलाके की तरक्की भी रफ्तार पकड़ सके।
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