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Home » रांची में ‘राइज अप’ की संवेदनाओं से भरी शाम… जानें
झारखंड

रांची में ‘राइज अप’ की संवेदनाओं से भरी शाम… जानें

November 16, 2025No Comments3 Mins Read
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रांची
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Ranchi : रांची की ठंडी हवा उस शाम कुछ ज्यादा भारी लग रही थी। लालपुर चौक पर खड़ी मोमबत्तियों की लौ मामूली नहीं थीं। वे उन अनगिनत जिंदगियों की याद में जल रही थीं, जो सड़क पर अपनी आखिरी सांसें छोड़ गईं। पास ही खड़ा एक बुजुर्ग अपनी मोमबत्ती थामे धीरे से कह रहा था, “इस बार हम खोए हैं, अगली बार कोई और न खोए…” इस गहरी खामोशी के बीच, सड़क सुरक्षा पर काम करने वाली संस्था ‘राइज अप’ ने वर्ल्ड डे ऑफ रिमेंबरेंस फॉर रोड ट्रैफिक विक्टिम्स को सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं बनाया, बल्कि उसे एक भावनात्मक अनुभव में बदल दिया ऐसा अनुभव जो हर राहगीर को रुककर सोचने पर मजबूर कर रहा था।

नुक्कड़ नाटक जिसने भीड़ को थाम लिया

सुबह मोरहाबादी मैदान का नजारा अलग था। वहां राइज अप और JFTA के कलाकारों का नुक्कड़ नाटक शुरू हुआ ही था कि लोग खुद-ब-खुद कदम रोककर देखने लगे। एक दृश्य में एक मां हेलमेट न पहनने की वजह से हादसे में खोए अपने बेटे की फोटो थामकर रो रही थी और यह दृश्य किसी कहानी का हिस्सा नहीं, सैकड़ों घरों की सच्चाई की गूंज थी। संदेश साफ था तेज रफ्तार, नशे में ड्राइविंग और हेलमेट की अनदेखी सिर्फ नियम तोड़ना नहीं, किसी परिवार की दुनिया तोड़ देना है।

कैंडल की लौ के साथ उठता सवाल : आखिर कब तक?

शाम होते-होते लालपुर चौक भावनाओं का दूसरा रंग दिखा रहा था। हाथों में मोमबत्तियाँ, आंखों में खोए अपनों की तस्वीरें और दिल में वही सवाल… क्या सड़कें कभी सुरक्षित होंगी? कई युवा वहां खड़े होकर कह रहे थे कि वे अब नियमों को “डर” से नहीं बल्कि “जिम्मेदारी” से मानेंगे। एक छात्रा ने मोमबत्ती जलाते हुए कहा, “हम अपनी जान से खेलते हैं, और सोचते हैं कि हमें कुछ नहीं होगा। लेकिन हादसे कभी बताकर नहीं आते।” राइज अप के सदस्यों ने सिर्फ श्रद्धांजलि ही नहीं दी, बल्कि लोगों को यह एहसास दिलाया कि सड़क सुरक्षा एक अभियान नहीं, एक आदत होनी चाहिए।

UN द्वारा मान्यता, पर जमीनी बदलाव अभी बाकी

संयुक्त राष्ट्र ने 2005 में नवंबर के तीसरे रविवार को आधिकारिक रूप से वर्ल्ड डे ऑफ रिमेंबरेंस फॉर रोड ट्रैफिक विक्टिम्स घोषित किया था। इसका उद्देश्य दुनिया भर के पीड़ितों के परिवारों को न्याय और समर्थन देना है। पर असली बदलाव तभी होगा जब हर नागरिक इस दिन को सिर्फ याद न करे, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में सड़क सुरक्षा को अपनाए।

एक उम्मीद जो हर लौ के साथ जली

रांची में बीती शाम सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं थी। यह उन आवाज़ों की प्रतिध्वनि थी, जिन्हें हम अक्सर अनसुना कर देते हैं। यह उन चेहरों की याद थी, जिन्हें सड़क ने हमसे छीन लिया। और यह उन उम्मीदों की रोशनी थी, जो हर मोमबत्ती की लौ में जल रही थी कि शायद अगला हादसा रोका जा सके।

इसे भी पढ़ें : IPL 2026 : मिनी नीलामी से पहले रिटेंशन की अंतिम तिथि आज, ट्रेड बाजार में हलचल तेज

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