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Ranchi : उम्र के ढलते पड़ाव में जब शरीर साथ छोड़ रहा हो, तब डॉक्टर के पर्चे और दवा के बिलों की मोटी फाइलें संभालना किसी इम्तिहान से कम नहीं होता। अब तक CCL यानी सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड से रिटायर्ड बुजुर्ग कर्मियों की एक आम तस्वीर यही थी कि पेंशन के बाद भी वे मेडिकल बिल पास कराने के लिए फाइलों का पुलिंदा हाथ में थामे दफ्तरों के काउंटरों पर चक्कर काटते नजर आते थे। लेकिन अब यह भागदौड़ बीते दिनों की बात बन चुकी है। 10 सितंबर को सीसीएल दरभंगा हाउस के मंथन सभागार में शुरू हुआ ‘CPRMSE/NE Portal 2.0’ इन बुजुर्गों के चेहरों पर सुकून लौटाने वाली एक बड़ी राहत बनकर सामने आया है।
धक्के खाने और कागजों के बंडलों से मिला छुटकारा
बरसों तक कोयला खदानों और दफ्तरों में कंपनी की तरक्की के लिए पसीना बहाने वाले कर्मियों को रिटायरमेंट के बाद अपनी ही जेब से हुए इलाज का पैसा वापस पाने के लिए लंबी कतारों में लगना पड़ता था। कभी कोई पर्चा छूट जाता तो कभी अधिकारी की गैरमौजूदगी में चक्कर काटने पड़ते थे। नए पोर्टल के शुरू होने से यह सारी झंझट खत्म हो गई है। अब किसी भी पूर्व कर्मचारी को अपने बिल लेकर रांची या किसी क्षेत्रीय कार्यालय जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वे घर के ड्रॉइंग रूम में बैठकर, अपने सामान्य स्मार्टफोन और रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर से एक क्लिक में सारे जरूरी बिल अपलोड कर सकेंगे।

एक स्क्रीन पर दिखेगा मेडिकल बिल का पूरा सफर
अक्सर यह शिकायत रहती थी कि बिल जमा तो कर दिया, लेकिन यह पता ही नहीं चलता था कि फाइल किस मेज पर अटकी है। नए सिस्टम में इस उलझन का पक्का इलाज कर दिया गया है। आमतौर पर मेडिकल बिल को पास कराने में पीआरबी (पेंशन एवं रिटायरमेंट बेनिफिट्स), सीएमएस मेडिकल और फाइनेंस जैसे तीन अलग-अलग विभागों की भूमिका होती है। अब ये तीनों विभाग सीधे एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जुड़ गए हैं। बिल कब जांचा गया, डॉक्टर की मंजूरी मिली या नहीं और खाते में पैसा कब ट्रांसफर होगा, यह सारी जानकारी मोबाइल स्क्रीन पर पारदर्शी तरीके से सामने दिखती रहेगी।
कंपनी की अपनी टीम ने समझा बुजुर्गों का दर्द
इस पूरे डिजिटल बदलाव की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसे बाहर की किसी निजी एजेंसी से तैयार नहीं कराया गया, बल्कि CCL के सिस्टम विभाग ने खुद इन-हाउस तैयार किया है। इसके निर्माण में स्वास्थ्य और वित्त विभाग के विशेषज्ञों ने आपसी तालमेल से काम किया ताकि सिस्टम इतना सीधा और आसान रहे कि तकनीक से अनजान बुजुर्ग भी इसे बिना किसी परेशानी के इस्तेमाल कर सकें। महाप्रबंधक आलोक कुमार ने इस कदम के मानवीय पहलू को रेखांकित करते हुए साफ किया कि कोई भी संस्थान केवल मुनाफे और कोयला उत्पादन के आंकड़ों से महान नहीं बनता, बल्कि इस बात से बनता है कि वह अपने उन साथियों का कितना ख्याल रखता है जिन्होंने अपनी पूरी जवानी उसे सींचने में लगा दी। कागजों के भारी बंडलों से डिजिटल क्लिक तक का यह सफर एक तकनीकी अपग्रेड तो है ही, साथ ही अपने बुजुर्ग साथियों के सम्मान और सेहत की फिक्र का एक संवेदनशील भरोसा भी है।
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