अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :
Ranchi : दफ्तर की फाइलों, कोयले के उत्पादन के आंकड़ों और रोजमर्रा की आपाधापी के बीच अगर कलम किसी रचनात्मक सोच को उकेरने लगे, तो माहौल का बदलना तय है। CCL यानी सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड के रांची स्थित मुख्यालय में इन दिनों कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। राजभाषा माह के मौके पर मानव संसाधन विकास विभाग का हॉल आम दिनों से काफी अलग दिखा। मौका था हिंदी निबंध प्रतियोगिता का, जहां अधिकारियों और कर्मचारियों ने अपनी व्यस्त दिनचर्या से वक्त निकालकर शब्दों की दुनिया में गोता लगाया।
गैर-हिंदी भाषियों ने तोड़ी झिझक, दिल से जुड़े शब्द
इस पूरे आयोजन की सबसे दिलचस्प और खूबसूरत तस्वीर वह थी, जब हिंदी भाषी साथियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उन कर्मचारियों ने भी मेज पर कागज फैलाए, जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है। कोई दक्षिण भारत की पृष्ठभूमि से था तो कोई पूर्वोत्तर या अन्य गैर-हिंदी भाषी राज्यों से, लेकिन जब बात विचारों को पन्नों पर उतारने की आई, तो भाषा किसी के लिए दीवार नहीं बनी। टूटे-फूटे संकोच को पीछे छोड़ते हुए इन प्रतिभागियों ने जिस सहजता से अपनी बात रखी, उसने हॉल में मौजूद हर शख्स का दिल जीत लिया। पिछले साल की तुलना में इस बार कुर्सियां ज्यादा भरी हुई थीं और चेहरों पर अपनी बात कहने की ललक कहीं ज्यादा साफ नजर आ रही थी।

कंपनी का मकसद भी सिर्फ एक रस्मी प्रतियोगिता कराकर इतिश्री कर लेना नहीं है, बल्कि उस झिझक को तोड़ना है जो अक्सर सरकारी या तकनीकी कामकाज में हिंदी लिखते वक्त आड़े आती है। प्रबंधन का मानना है कि जब तक लोग दिल से नहीं जुड़ेंगे, तब तक भाषा का दायरा दफ्तरों में नहीं बढ़ सकता।
खदानों तक पहुंचा उत्साह, बेहतर काम पर मिलेगा सम्मान
इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए इस बार उन नोडल अफसरों की पीठ थपथपाने की भी तैयारी है, जो जमीन पर उतरकर हिंदी के माहौल को आसान बना रहे हैं। इसके लिए दो नए सम्मान शुरू किए जा रहे हैं, ताकि जो लोग नए प्रयोग कर रहे हैं या लगातार मेहनत से हिंदी को रोजमर्रा के काम का हिस्सा बना रहे हैं, उन्हें सही पहचान मिल सके।
यह हलचल केवल रांची के बड़े दफ्तरों के कमरों तक सिमटी नहीं है। सीसीएल के सुदूर खदान इलाकों और परियोजनाओं में भी इन दिनों ऐसी ही रौनक है। कहीं कोई कोलियरी का बाबू निबंध लिख रहा है, तो कहीं फील्ड का इंजीनियर हिंदी में अपनी रिपोर्ट तैयार करने की कोशिश कर रहा है। रोज की मशीनी जिंदगी के बीच शब्दों का यह मेला कर्मचारियों को आपस में जोड़ने और अपनी बात को खुलकर कहने का एक आत्मीय जरिया बन गया है।
इसे भी पढ़ें : शटल की सनसनाहट और पिंग-पॉन्ग की खनक, फाइलों की जगह रैकेट थाम उतरे CCL कर्मी

