अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :
Pakur (Jaydev Kumar) : सुबह की हल्की धूप जैसे ही डीपीएस पाकुड़ के आंगन में उतरती है, बच्चों की चहल–पहल पूरे परिसर को रंगों से भर देती है। कोई पंजाबी सूट में गिद्दा के कदम आजमा रहा है, कोई गुजराती पगड़ी संभालने में लगा है, तो कोई तमिलनाडु की परंपरागत वेशभूषा में बड़े गौरव से खड़ा है। देखने वाला हर व्यक्ति अनायास ही मुस्कुरा उठता है। यह किसी त्योहार की आम हलचल नहीं, बल्कि देश की विविधता को अपनी छोटी-छोटी हथेलियों में समेटे इन नन्हे बच्चों का भाषा मेला है।
अनेक भाषाएं, एक ही उत्साह
भाषा उत्सव के पहले दो दिनों ने बच्चों के भीतर एक नई ऊर्जा भर दी थी। कभी हिंदी में परिचय देते हुए, कभी बांग्ला की मधुरता में खोते हुए, तो कभी कन्नड़ या असमिया के स्वर में कविता गुनगुनाते हुए, बच्चों ने जैसे भारत की आत्मा को आवाज दी हो। प्रत्येक भाषा के साथ बच्चे सिर्फ शब्द नहीं बोल रहे थे। वे अपनी मुस्कान, अपने हावभाव और अपने आत्मविश्वास के साथ यह साबित कर रहे थे कि भारत का असली सौंदर्य उसकी भाषाओं में ही बसता है।

जब बच्चों से मुखातिब हुईं पुलिस कप्तान
05 दिसंबर की सुबह का सबसे खास क्षण तब आया जब पाकुड़ की पुलिस कप्तान निधि द्विवेदी स्कूल पहुंचीं। कोई बच्चा अपने स्टॉल पर खड़ा होकर उनका इंतज़ार कर रहा था, तो कोई बार–बार तैयारी को दोहराता दिख रहा था। उनके कदमों के साथ जैसे बच्चों की उम्मीदें भी चल रही थीं। वह जब किसी स्टॉल पर रुककर किसी छात्र से पूछतीं – “यह त्यौहार कैसे मनाया जाता है?” तो बच्चा अपने पूरे उत्साह से जवाब देता। उनके चेहरे पर आती मुस्कान बच्चों के आत्मविश्वास को और बढ़ा देती। उनकी सादगी और रुचि देखकर बच्चों के भीतर यह भाव और प्रबल होता गया कि उनकी मेहनत सार्थक है, उनका प्रयास किसी बड़े व्यक्ति की निगाह में जगह बना चुका है।

“भारत की हर भाषा खूबसूरत, पर मातृभाषा को कभी मत भूलिए”
अपने संबोधन में एसपी निधि ने कहा, “भारत की हर भाषा खूबसूरत है, लेकिन अपनी मातृभाषा को कभी मत भूलिए। मातृभाषा हमारी जड़ होती है। जिस पेड़ की जड़ मजबूत हो, उसकी शाखाएं खुद-ब-खुद मजबूत होती चली जाती हैं।” यह बात सुनते ही कई बच्चों की आंखों में चमक उतर आई। उन्हें लगा कि वे सचमुच किसी महत्वपूर्ण विरासत को थामे हुए हैं।
संस्कृति की सुगंध से भरा स्कूल कैंपस
मेला सिर्फ भाषा पर नहीं रुका। हर स्टॉल पर अलग-अलग प्रदेशों की खुशबू थी। कहीं बिहार के ठेकुआ की महक थी, कहीं गुजरात के ढोकले की। कहीं बंगाल के गीत गूंज रहे थे, तो कहीं तमिल लोककला के रंग बिखरे थे। टीचर्स और अभिभावक भी इन रंगों में खो गए। बच्चे अपने प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हुए एक गर्व की चमक लिए खड़े थे, जैसे अपनी पहचान पूरी दुनिया को दिखाने को तैयार हों।

स्कूल प्रबंधन की संवेदनशील पहल
डीपीएस पाकुड़ के निदेशक अरुणेंद्र कुमार ने कहा कि किसी भी संस्कृति को समझने की पहली सीढ़ी उसकी भाषा है। प्रिंसिपल जेके शर्मा ने बच्चों के प्रयासों को सराहा और अभिभावकों का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन बच्चों को सिर्फ जानकारी नहीं देते, बल्कि उन्हें यह एहसास दिलाते हैं कि वे एक ऐसे देश में रहते हैं जहां विविधता ही सबसे बड़ी ताकत है।
बच्चों के मन की भाषा
मेला समाप्त हुआ, लेकिन बच्चों के दिलों में जो सीख बस गई, वह लंबे समय तक साथ चलेगी। वे समझ चुकी थे कि भाषा सिर्फ संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि भावनाओं का पुल है। और सबसे महत्वपूर्ण बात- मातृ भाषा वह धागा है जो हमें हमारी जड़ों से बांधे रखता है।
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