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Garhwa (Nityanand Dubey) : स्कूल के सामान्य दिनों की तरह यह सुबह भी थी, लेकिन कस्तूरबा गांधी बालिका उच्च विद्यालय, हंसकेर की छात्राओं के लिए यह दिन अलग होने वाला था। कक्षा, किताबें और पाठ्यक्रम से आगे, इस दिन उन्हें वह सीख मिलने जा रही थी, जो उनके जीवन के सबसे कठिन मोड़ों पर सहारा बन सकती है। यह सीख थी न्याय, अधिकार और कानूनी सुरक्षा की।
बेटियों की आंखों में जागी नई समझ
ग्राउंड में बैठी सैकड़ों छात्राओं के चेहरों पर उत्सुकता साफ झलक रही थी। जैसे ही जिला विधिक सेवा प्राधिकार (DLSA), गढ़वा की सचिव निभा रंजन लकड़ा मंच पर पहुंचीं, छात्राओं की नजरें ध्यानपूर्वक उनकी तरफ उठ गईं। उन्होंने सवाल पूछा, “अगर कोई आपके साथ अन्याय करे, तो आप क्या करेंगी?” कई चेहरों पर सवाल के साथ मौन छा गया, कुछ डर, कुछ अनिश्चितता। फिर उन्होंने समझाया कि न्याय पैसे वालों के लिए नहीं, बल्कि हर बच्ची, हर नागरिक के लिए है। उन्होंने बताया कि आर्थिक स्थिति कमजोर हो या शानदार, अगर किसी को न्याय चाहिए, तो राज्य उसे मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराता है। उनके शब्दों ने वहाँ बैठी बच्चियों को पहली बार महसूस कराया कि वे भी कानून के सहारे खड़ी हो सकती हैं।
हम अकेले नहीं हैं… छात्राओं को मिला आत्मविश्वास
एलएडीसी सुधीर कुमार तिवारी ने बहुत सरल भाषा में समझाया कि DLSA कैसे किसी गरीब, असहाय या परेशान व्यक्ति के लिए मुफ्त वकील, कानूनी सलाह और सहायता मुहैया कराता है। उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से उन स्थितियों का ज़िक्र किया, जिनमें बच्चियाँ या उनके परिवार कानूनी मदद ले सकते हैं, चाहे वह घरेलू हिंसा का मामला हो, बाल विवाह, स्कूल से वंचित करने की स्थिति या कोई अन्य अन्याय। उन्होंने कहा, “कानून का दरवाजा सबके लिए खुला है, बस आपको यह जानना चाहिए कि वहाँ पहुँचना कैसे है। यही जानकारी हम देने आए हैं।”
शिक्षक के शब्दों में हौसला, छात्राओं की तालियों में विश्वास
प्रधानाचार्य व पीएलवी मुरली श्याम तिवारी ने बच्चियों की ओर देखकर कहा, “अधिकार सिर्फ किताबों में नहीं, ज़िंदगी में इस्तेमाल करने के लिए होते हैं।” उनके ये शब्द छात्राओं के भीतर आत्मबल भरने के लिए काफी थे। कार्यक्रम के अंत में कई बच्चियाँ आगे आईं, सवाल किए, और पहली बार खुलकर बोलीं कि उन्हें अब लगता है- न्याय मांगना उनका हक है, एहसान नहीं।
एक दिन… जिसने बदल दी सोच
यह सिर्फ कार्यक्रम नहीं था, यह उन बच्चियों के लिए एक ऐसा दरवाज़ा था, जहां से उन्होंने जाना कि वे अब सिर्फ छात्रा नहीं, बल्कि अपने अधिकारों को जानने और बचाने वाली जागरूक नागरिक भी हैं। गढ़वा DLSA की यह पहल उन कई घरों में रोशनी पहुँचाएगी, जहाँ अन्याय चुपचाप सहा जाता है।
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