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Chatra : टंडवा के पथरीले रास्तों और कोयले की धूल के बीच जहां दिन-रात टरबाइन की गूंज सुनाई देती है, वहां बुधवार की सुबह का माहौल बिल्कुल जुदा था। अमूमन फाइलों, तकनीकी मशीनों और भारी सुरक्षा घेरे में मशगूल रहने वाले एनटीपीसी नॉर्थ करणपुरा के चेहरे आज एक अलग ही रंग में रंगे नजर आए। मौका था ‘स्वच्छता ही सेवा 2026’ अभियान के आगाज का। 17 सितंबर से शुरू होकर 2 अक्टूबर यानी बापू की जयंती तक चलने वाले इस पखवाड़े का असर पहले ही दिन सेवा भवन के आंगन में साफ महसूस किया गया, जहां इंजीनियर से लेकर ठेका मजदूर तक एक कतार में खड़े होकर सफाई का संकल्प ले रहे थे।
दफ्तर के कमरों से निकलकर जमीन से जुड़ी मुहिम
प्रशासनिक परिसर ‘सेवा भवन’ में सुबह जैसे ही घड़ियां बजीं, वहां मौजूद हर शख्स का ध्यान एक साझा शपथ पर था। यह शपथ किसी औपचारिकता जैसी नहीं लगी, बल्कि बातचीत में कर्मियों का कहना था कि बिजली का उत्पादन जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उस परिसर को सांस लेने लायक बनाए रखना भी है। अधिकारियों ने भी दो-टूक कहा कि सफाई केवल चपरासी या झाड़ू लगाने वाले का काम नहीं, बल्कि टेबल पर बैठने वाले अफसर की भी उतनी ही जिम्मेदारी है। इस बार जोर केवल प्लांट के शीशे चमकाने पर नहीं है, बल्कि उस कचरे के सही निपटारे पर है जो अक्सर नजरअंदाज रह जाता है।

गांवों की पगडंडियों तक पहुंचेगी सफाई की अलख
इस पखवाड़े का असली इम्तिहान प्लांट की चहारदीवारी के पार टंडवा के आसपास बसे गांवों में होना है। परियोजना से सटे इलाकों में अक्सर यह शिकायत रहती है कि बड़े उद्योग अपनी बाउंड्री के भीतर तो सब चकाचक रखते हैं, लेकिन बाहर की सुध कम लेते हैं। इस बार एनटीपीसी ने रणनीति बदली है। अगले पंद्रह दिनों में कर्मचारियों की टोलियां स्थानीय ग्रामीणों, महिलाओं और युवाओं के साथ मिलकर नालियों, चौराहों और साझा रास्तों की सफाई करेंगी। मकसद यह है कि सफाई का काम एक दिन का तमाशा बनकर न रह जाए, बल्कि गांव के लोग खुद अपनी गलियों को साफ रखने के लिए आगे आएं।
आदत बदलने की जद्दोजहद
असल चुनौती कूड़ा उठाने से ज्यादा लोगों की पुरानी सोच को बदलना है। दो अक्टूबर तक चलने वाले इस सिलसिले में नुक्कड़ नाटकों, प्रभात फेरियों और बच्चों के जरिए सीधे परिवारों से संवाद साधा जाएगा। जब तक लोग पॉलीथिन फेंकने से पहले झिझकेंगे नहीं और अपने घर का कचरा सड़क पर डालने से बचेंगे नहीं, तब तक कोई भी बड़ा अभियान अधूरा ही रहेगा। टंडवा की तपती दोपहर में ली गई यह शपथ अगर पंद्रह दिनों बाद भी लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में कायम रही, तभी इस पूरे पखवाड़े की असली कामयाबी मानी जाएगी।
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