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Home » 151वीं जयंती पर याद किये गये राजकुमार शुक्ल, रांची से उठी भारत रत्न देने की बुलंद आवाज
झारखंड

151वीं जयंती पर याद किये गये राजकुमार शुक्ल, रांची से उठी भारत रत्न देने की बुलंद आवाज

August 23, 2026No Comments4 Mins Read
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Ranchi : चंपारण सत्याग्रह का नाम आते ही महात्मा गांधी का जिक्र होता है, लेकिन गांधीजी को चंपारण की धरती तक पहुंचाने वाले किसान नेता पंडित राजकुमार शुक्ल को इतिहास में वह जगह नहीं मिल पाई, जिसके वे हकदार थे। उनकी 151वीं जयंती पर रविवार को रांची प्रेस क्लब में आयोजित समारोह में यही सवाल प्रमुखता से उठा। हिंदी साहित्य भारती, झारखंड और पंडित राजकुमार शुक्ल फाउंडेशन के संयुक्त आयोजन में वक्ताओं ने केंद्र सरकार से पंडित राजकुमार शुक्ल को मरणोपरांत भारत रत्न देने की मांग की।

समारोह में मुख्य अतिथि विधायक एवं पूर्व मंत्री सीपी सिंह ने कहा कि राजकुमार शुक्ल सिर्फ एक किसान नहीं थे, बल्कि उन्होंने किसानों की पीड़ा को देश के स्वतंत्रता आंदोलन का मुद्दा बना दिया था। उन्होंने अपनी बात मनवाने के लिए लगातार संघर्ष किया और महात्मा गांधी को चंपारण आने के लिए तैयार किया। उनकी इसी कोशिश के बाद 1917 का चंपारण सत्याग्रह देश के स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना।

गांधीजी को चंपारण लाने के लिए अड़े रहे राजकुमार शुक्ल

साहित्यकार डॉ. मयंक मुरारी ने कहा कि राजकुमार शुक्ल भारतीय किसान की संघर्षशील चेतना के प्रतीक हैं। इतिहास में आम तौर पर बड़े आंदोलनों के प्रमुख नेताओं को याद किया जाता है, लेकिन उन आंदोलनों की जमीन तैयार करने वाले लोगों को कई बार भुला दिया जाता है। राजकुमार शुक्ल ने अपनी जिद, प्रतिबद्धता और राष्ट्रहित की भावना के दम पर गांधीजी को चंपारण तक पहुंचाया।

उन्होंने कहा कि शुक्ल ने किसानों की समस्या को केवल स्थानीय मुद्दा बनकर नहीं रहने दिया। उन्होंने इसे राष्ट्रीय स्तर पर उठाया। उनके प्रयासों से किसान की आवाज देश के बड़े राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा बनी।

झारखंड विधानसभा के पूर्व संयुक्त सचिव मिथिलेश कुमार मिश्र ने कहा कि राजकुमार शुक्ल का योगदान केवल चंपारण तक सीमित नहीं था। उनका संघर्ष किसान अधिकारों और लोकतांत्रिक चेतना को मजबूत करने वाला था। आज की पीढ़ी को ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में बताने की जरूरत है, जिन्होंने बिना किसी बड़े पद या राजनीतिक ताकत के देश के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हिंदी साहित्य भारती अंतरराष्ट्रीय के महासचिव श्रीनिवास शुक्ल ने कहा कि पंडित राजकुमार शुक्ल की कहानी किसान के आत्मसम्मान और संघर्ष की कहानी है। डॉ. अरुण सज्जन ने कहा कि साहित्य और इतिहास के माध्यम से उनके योगदान को देशभर में सामने लाने की जरूरत है।

गांधी-गेट वार्ता को इतिहास में मिले उचित स्थान

कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी साहित्य भारती अंतरराष्ट्रीय, झारखंड एवं पंडित राजकुमार शुक्ल फाउंडेशन के अध्यक्ष अजय राय ने की। उन्होंने कहा कि पंडित राजकुमार शुक्ल ने चंपारण सत्याग्रह की जमीन तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई, लेकिन उन्हें आज तक उनके योगदान के अनुरूप राष्ट्रीय सम्मान नहीं मिला। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि राजकुमार शुक्ल को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया जाए।

अजय राय ने रांची से जुड़े गांधी-गेट वार्ता प्रसंग का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1917 में रांची में महात्मा गांधी और तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एडवर्ड गेट के बीच चंपारण के किसानों की समस्या को लेकर महत्वपूर्ण बातचीत हुई थी। इस प्रसंग को भी इतिहास में उचित स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि चंपारण के खेतों से उठी किसानों की आवाज राजकुमार शुक्ल के प्रयासों से गांधीजी तक पहुंची और आगे चलकर इसने किसान आंदोलन की दिशा बदल दी।

समारोह में स्वास्थ्य, समाज सेवा और कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए डॉ. सतीश शर्मा, शंकर दुबे और डॉ. मृणालिनी अखौरी को मोमेंटो और शॉल देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. पूजा रत्नाकर ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन अशोक कुमार शुक्ला ने किया।

इस मौके पर अशोक कुमार शुक्ला, अमित कश्यप, अजय शर्मा, अरुण अग्रवाल, संजय सर्राफ, बालेश्वर शर्मा, शिव कुमार झा, सुरेंद्र सिंह, असलम खान, त्रिपुरेश्वर मिश्र, बबलू कुमार, देवानंद राय, अनिकेत सिंह, मुकेश साहू, रमेश साहू, आलोक झा, उपेन्द्र कुमार, बहादुर सिंह, जलील अंसारी, मनोज भट्ट, विकास कुमार समेत बड़ी संख्या में साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और गणमान्य नागरिक मौजूद रहे। सभी ने पंडित राजकुमार शुक्ल के संघर्ष, किसान चेतना और देश के स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी।

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