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Ranchi (Rakhi Thakur) : त्योहार वही है जो किसी के चेहरे पर मुस्कान ले आए, और जब यह मुस्कान उन बेजुबानों के हिस्से आए जो अपनी तकलीफ बोल भी नहीं सकते, तो त्योहार का रंग और गहरा हो जाता है। रक्षाबंधन के दिन जब चारों तरफ भाई-बहन की नोकझोंक और मिठाइयों की खुशबू होती है, तब रांची के एक घर में रक्षा का एक अलग ही मतलब देखने को मिलता है। सेंट माइकल्स स्कूल में पांचवीं की छात्रा 9 साल की कायरा मिश्रा थाली सजाकर अपने उन दोस्तों के पास पहुंचती हैं, जिनके पास दर्द सहने की ताकत तो है, पर शिकायत करने के लिए शब्द नहीं हैं। वह पूरी शिद्दत से रेस्क्यू किए गए कुत्तों और बिल्लियों के पंजों पर राखी बांधती हैं और उनसे उनकी जिंदगी भर रक्षा करने का वादा करती हैं।

दर्द की मार झेल चुके जानवरों का आशियाना
कायरा के घर का आंगन सिर्फ एक मकान नहीं, बल्कि उन बेजुबानों के लिए नई जिंदगी की पनाहगाह है जिन्हें समाज ने बेसहारा छोड़ दिया था। यहां करीब 12 से 15 ऐसे जानवर रहते हैं जिन्हें सड़क हादसों या गंभीर बीमारियों के बीच से बचाकर लाया गया। इनमें से किसी की रीढ़ की हड्डी टूटी थी, तो कोई खून से लथपथ जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा था। कायरा के माता-पिता ने इन्हें सिर्फ दवा देकर नहीं छोड़ा, बल्कि अपने घर और दिल में हमेशा के लिए जगह दी। कायरा के लिए ये जानवर महज पालतू नहीं, बल्कि परिवार के ऐसे सदस्य हैं जिनके बिना उनका दिन पूरा नहीं होता।

किताबों से ज्यादा बेजुबानों की तकलीफ समझने का हुनर
जिस उम्र में बच्चे खिलौनों और वीडियो गेम्स में खोए रहते हैं, उस नन्हीं सी उम्र में कायरा सेवा और संवेदना का पाठ पढ़ रही हैं। स्कूल का बस्ता उतारते ही वह सीधे अपने इन चार पैरों वाले दोस्तों के पास पहुंच जाती हैं। किसे कब खाना देना है, किस जख्मी कुत्ते की मरहम-पट्टी का वक्त हो गया है और किसको दवा खिलानी है, यह सब कायरा अपनी देखरेख में करवाती हैं। उनके चेहरे पर इन जानवरों के लिए जो फिक्र दिखती है, वह सिखाती है कि इंसानियत किसी उम्र की मोहताज नहीं होती। कायरा का मानना है कि ये बेजुबान हमारे मोहल्ले और पर्यावरण का हिस्सा हैं, इसलिए इनके साथ नफरत नहीं बल्कि प्यार से पेश आना चाहिए।

सीएम हेमंत सोरेन से नन्हीं गुहार, बेजुबानों के लिए भी बने सुरक्षा कवच
राखी के इस धागे के साथ कायरा ने अपनी एक बड़ी चिंता भी साझा की है। उन्होंने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से गुहार लगाई है कि राज्य में जानवरों पर होने वाले जुल्म को रोकने के लिए सख्त और असरदार कानून बनाए जाएं। कायरा चाहती हैं कि कोई भी इंसान किसी लाचार जानवर पर हाथ उठाने या गाड़ी चढ़ाने से पहले कानून के डर से कांप जाए। एक नौ साल की बच्ची की यह पहल पूरे समाज के सामने एक आईना रखती है कि असली त्योहार वही है, जहां हर कमजोर और बेसहारा को सुरक्षा का भरोसा मिल सके।
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