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Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने आउटसोर्सिंग कंपनी राइडर सिक्योरिटी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड को बड़ी राहत देते हुए राज्य सरकार के ब्लैकलिस्टिंग आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी भी कंपनी या संस्था को ब्लैकलिस्ट करना कोई सामान्य प्रशासनिक फैसला नहीं है। इसका सीधा असर उसके भविष्य के कारोबार पर पड़ता है। ऐसे में बिना स्पष्ट कारण बताओ नोटिस और बिना पूरा मौका दिए किसी कंपनी को ब्लैकलिस्ट नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने 30 जून को यह अहम फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन हर हाल में किया जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो ब्लैकलिस्टिंग जैसा आदेश कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता।
क्या था पूरा मामला
मामला राइडर सिक्योरिटी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड की ओर से दायर डब्ल्यूपी (सी) संख्या 1867/2023 से जुड़ा है। कंपनी ने ग्रामीण विकास विभाग के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसका अनुबंध समाप्त करने के साथ-साथ उसे ब्लैकलिस्ट भी कर दिया गया था। कंपनी का कहना था कि विभाग ने जो कारण बताओ नोटिस जारी किया था, उसमें सिर्फ अनुबंध समाप्त करने की बात कही गई थी। कहीं भी यह नहीं लिखा गया था कि कंपनी को ब्लैकलिस्ट भी किया जा सकता है। इसके बावजूद बाद में ब्लैकलिस्ट करने का आदेश जारी कर दिया गया।
कोर्ट ने नोटिस की खामियों पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने 31 जनवरी 2023 को जारी कारण बताओ नोटिस का बारीकी से अध्ययन किया। अदालत ने पाया कि नोटिस में ब्लैकलिस्टिंग का कोई जिक्र ही नहीं था। कोर्ट ने कहा कि अगर सरकार किसी कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने का फैसला लेना चाहती है तो उसे पहले स्पष्ट रूप से यह बताना होगा कि ऐसी कार्रवाई प्रस्तावित है। तभी संबंधित कंपनी अपना प्रभावी पक्ष रख सकती है। बिना यह जानकारी दिए सीधे ब्लैकलिस्ट करना कानून के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
ब्लैकलिस्टिंग का असर बहुत बड़ा होता है
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि ब्लैकलिस्टिंग किसी भी कंपनी के लिए बेहद गंभीर कार्रवाई होती है। एक बार ब्लैकलिस्ट होने के बाद कंपनी लंबे समय तक सरकारी टेंडर और अनुबंधों से बाहर हो सकती है। इससे उसके कारोबार और प्रतिष्ठा दोनों पर असर पड़ता है। इसी वजह से ऐसी कार्रवाई करते समय प्रशासन को पूरी कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का भी उल्लेख किया। इनमें गोरखा सिक्योरिटी सर्विसेज बनाम दिल्ली सरकार, कुलजा इंडस्ट्रीज लिमिटेड और वेटइंडिया फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड से जुड़े फैसले शामिल हैं। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही साफ कर चुका है कि यदि कारण बताओ नोटिस में ब्लैकलिस्टिंग का प्रस्ताव नहीं है, तो बाद में ब्लैकलिस्ट करने का आदेश कानूनी रूप से टिक नहीं सकता।
अनुबंध खत्म करने के मुद्दे पर फिलहाल कोई फैसला नहीं
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने कंपनी का अनुबंध समाप्त करने के मुद्दे पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। अदालत ने कहा कि अनुबंध की अवधि अब समाप्त हो चुकी है। ऐसे में यदि कंपनी चाहे तो इस संबंध में सक्षम प्राधिकारी या उचित न्यायिक मंच के समक्ष उपलब्ध कानूनी उपाय अपना सकती है।
ब्लैकलिस्टिंग का आदेश रद्द, बाकी अधिकार सुरक्षित
अपने अंतिम आदेश में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से जारी ब्लैकलिस्टिंग आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि सरकार ने इस कार्रवाई में जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया था। साथ ही कोर्ट ने अनुबंध समाप्ति से जुड़े सभी पक्षों के अधिकार सुरक्षित रखते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया।
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