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Ranchi (Rudra Ranjeet) : माघी पूर्णिमा की सुबह रांची के पीपी कंपाउंड में कुछ अलग ही माहौल था। ठंडी हवा के बीच, सूरज की हल्की किरणों के साथ लोग धीरे-धीरे गुरु नानक स्कूल परिसर की ओर बढ़ने लगे थे। हाथों में फूल, तस्वीरें और मन में श्रद्धा लिए हजारों लोग एक ही दिशा में चल रहे थे। कोई बस से उतरा था, कोई ट्रेन से आया था, तो कोई पूरी रात सफर कर सुबह यहां पहुंचा था। सबका मकसद एक था संत शिरोमणि रविदास जी की 649वीं जयंती में शामिल होना। यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था। यह आस्था की यात्रा थी।
जब गुरु नानक स्कूल बना श्रद्धा का केंद्र
कुछ ही घंटों में गुरु नानक स्कूल का मैदान लोगों से भर चुका था। हर तरफ रंग-बिरंगे झंडे, बैनर और संत रविदास की तस्वीरें नजर आ रही थीं। भजन की मधुर धुन, ढोलक की ताल और जयकारों की गूंज माहौल को भक्तिमय बना रही थी। कहीं बुजुर्ग ध्यान में बैठे थे, तो कहीं युवा मोबाइल से लाइव वीडियो बना रहे थे। परंपरा और तकनीक यहां एक साथ चल रही थी।

मंच पर नेता, दिलों में संत के विचार
दोपहर होते-होते मंच पर अतिथियों का आगमन शुरू हुआ। ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडे सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय, राज्यसभा सदस्य महुआ माजी, विधायक सीपी सिंह और सुरेश बैठा समेत कई प्रमुख चेहरे मंच पर मौजूद थे। लेकिन यह मंच केवल राजनीतिक भाषणों का स्थान नहीं बना। यहां संत रविदास के विचारों की चर्चा हुई। “मन चंगा तो कठौती में गंगा” केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि जीवन दर्शन बनकर उभरा।
ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडे सिंह ने संत रविदास के विचारों को आज के समय में भी प्रासंगिक बताया। उन्होंने कहा कि समाज तभी आगे बढ़ेगा, जब हर व्यक्ति को सम्मान और अवसर मिलेगा।
पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय और अन्य नेताओं ने भी सामाजिक समरसता पर जोर दिया।
युवाओं के कंधों पर परंपरा की जिम्मेदारी
इस आयोजन में सबसे खास बात थी युवाओं की भागीदारी। 22 वर्षीय राहुल रविदास सुबह से ही व्यवस्था संभाल रहे थे। “हम चाहते हैं कि हमारी पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे,” वे कहते हैं। युवाओं ने पार्किंग से लेकर मंच संचालन तक हर जिम्मेदारी संभाली। यह संकेत था कि परंपरा सुरक्षित हाथों में है।
महिलाओं की आवाज और आत्मसम्मान
कार्यक्रम में महिलाओं की भागीदारी भी कम नहीं थी। समूह में भजन गाती महिलाएं माहौल को और भावुक बना रही थीं। हजारीबाग से आईं एक महिला ने कहा, “पहले हमें बोलने का मंच नहीं मिलता था। आज हम सम्मान के साथ यहां खड़ी हैं।” उनकी बातों में आत्मविश्वास झलक रहा था।
भक्ति, संस्कृति और स्मृतियों का संगम
दोपहर बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हुए। भजन, प्रवचन और नाट्य प्रस्तुतियों ने संत रविदास के जीवन को जीवंत कर दिया। कुछ लोग आंखें बंद कर ध्यान में लीन थे। कुछ अपने मोबाइल में इन पलों को सहेज रहे थे। यह वर्तमान और भविष्य के बीच एक सेतु बन गया।
पर्दे के पीछे की मेहनत की कहानी
इस भव्य आयोजन के पीछे महीनों की तैयारी थी। झारखंड प्रदेश गुरु रविदास महासभा के अध्यक्ष दीपक कुमार रवि और उनकी टीम ने दिन-रात मेहनत की। मीडिया प्रभारी विशाल कुमार रवि कहते हैं,
“यह हमारे लिए सेवा है, जिम्मेदारी है।” कई स्वयंसेवक बिना किसी पहचान की चाह में पूरे दिन जुटे रहे।
शाम की विदाई और मन में भरा संदेश
जैसे-जैसे शाम हुई, लोग धीरे-धीरे लौटने लगे। कोई प्रसाद लेकर जा रहा था, तो कोई संत रविदास की तस्वीर। स्टेशन और बस स्टैंड की ओर जाती भीड़ के बीच भी संतोष साफ दिख रहा था। हर व्यक्ति अपने साथ एक संदेश लेकर लौट रहा था समानता, प्रेम और आत्मसम्मान का।
संत रविदास आज भी जीवित हैं विचारों में
संत रविदास की जयंती सिर्फ साल में एक बार नहीं आती। वह हर उस दिन जीवित रहती है, जब कोई व्यक्ति भेदभाव के खिलाफ खड़ा होता है। जब कोई गरीब बच्चा शिक्षा की ओर बढ़ता है। जब कोई महिला अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाती है। जब कोई युवा अपने समाज को आगे ले जाने का सपना देखता है। तभी संत रविदास सच में जीवित रहते हैं।
एक आयोजन नहीं, एक आंदोलन
रांची में आयोजित यह जयंती समारोह एक दिन का कार्यक्रम नहीं था। यह सामाजिक चेतना का उत्सव था। यह याद दिलाने वाला अवसर था कि बदलाव मंच से नहीं, लोगों के दिलों से शुरू होता है। और उस बदलाव की नींव रखी थी सदियों पहले संत रविदास ने।
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