अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :
Pakur (Jaydev Kumar) : पाकुड़ में आयोजित सत्संग के दौरान स्वामी परमहंस महाराज ने कहा कि जीवन में निष्ठा सबसे महत्वपूर्ण होती है। उन्होंने बताया कि मनुष्य का श्रेष्ठ और दुर्बल गुण भी निष्ठा है। यदि निष्ठा एक दिशा में रहती है, तो मनुष्य धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ता है, लेकिन कई जगह निष्ठा बंट जाने से मन में अशांति पैदा होती है। उन्होंने अर्जुन और भगवान कृष्ण का उदाहरण देते हुए बताया कि सच्चा भक्त अपने गुरु और ईश्वर के आदेशों का पालन करता है।
श्याम नगर में भव्य स्वागत
बिहार के बक्सर जिले के छोटका राजपुर से आए स्वामी परमहंस महाराज का पाकुड़ जिला मुख्यालय के श्याम नगर में गर्मजोशी से स्वागत किया गया। भक्तों ने वाइक रैली निकालकर उनका शहर में स्वागत किया। इस दौरान भक्तों ने डांडिया नृत्य भी प्रस्तुत किया और जयकारे लगाए।
आश्रम में विशेष पूजा और दर्शन
स्वामी जी का काफिला श्याम नगर स्थित ब्रह्म विद्यालय आश्रम पहुंचा, जहां संतों और वरिष्ठ सेवादारों ने पारंपरिक विधि से उनका सम्मान किया। आदिवासी परंपरा के अनुसार भी स्वागत किया गया। स्वामी जी ने सभी भक्तों को आशीर्वाद दिया। इसके बाद भक्तों को बारी-बारी दर्शन करवाए गए और प्रसाद भी वितरित किया गया। शाम को परमहंस दयाल भजन कीर्तन का आयोजन किया गया।
हर वर्ष दिसंबर में होता है आगमन
ब्रह्म विद्यालय आश्रम कई वर्षों से स्थापित है और दिसंबर महीने में स्वामी परमहंस महाराज यहां आते रहे हैं। इस वर्ष भी वे पांच दिनों के प्रवास पर पहुंचे हैं। इस दौरान आश्रम में प्रतिदिन सत्संग आयोजित होगा। पाकुड़ के बाद स्वामी जी पश्चिम बंगाल के आसनसोल जाएंगे। वहां से वे अन्य आश्रमों का दौरा करते हुए बेंगलुरु के लिए रवाना होंगे।
स्वामी परमहंस महाराज ने बताया निष्ठा का असली अर्थ, पाकुड़ के सत्संग में उमड़ा जनसैलाब pic.twitter.com/TwsbOgHEyv
— News Samvad (@newssamvaad) December 7, 2025
शहर में उत्सव जैसा माहौल
स्वामी जी के आगमन को लेकर पूरे शहर में उत्साह देखा गया। तोरण द्वार बनाए गए, आश्रम सजाया गया और विद्युत सज्जा की गई। पांच दिनों तक भंडारे का भी आयोजन किया गया है। इस मौके पर राजीव रंजन पांडे, बबलू सिंह, बप्पी बर्मन, राजू पांडेय, चंदन तिवारी, सुंदरम पांडेय, अर्जुन सिंह और राजेश पांडे सहित बड़ी संख्या में भक्त मौजूद रहे।
इसे भी पढ़ें : एसपी निधि के सामने चमका बच्चों का हुनर, DPS का भाषा मेला बना सीख का उत्सव

