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Ramgarh (Dharmendra Pradhan, Bhurkunda) : भुरकुंडा की उस बैठक में कोई चमक-दमक नहीं थी। न बड़े मंच थे, न भारी भीड़। फिर भी वहां मौजूद हर व्यक्ति जानता था कि यह सिर्फ एक संगठनात्मक औपचारिकता नहीं, बल्कि झारखंड के हजारों कोयला मजदूरों की आवाज को मजबूत करने की एक कोशिश है। अखिल झारखंड कोयला श्रमिक संघ की केंद्रीय कमेटी की बैठक में संगठन का विस्तार किया गया, जिससे मजदूरों की उम्मीदों को नया सहारा मिला।
मजदूरों की पीड़ा से निकली नेतृत्व की जिम्मेदारी
बैठक की अध्यक्षता कर रहे केंद्रीय अध्यक्ष रोशन लाल चौधरी ने कहा कि कोयला खदानों में काम करने वाला मजदूर रोज जान जोखिम में डालकर धरती का सीना चीरता है, लेकिन उसकी समस्याएं अक्सर फाइलों में दबकर रह जाती हैं। इसी वजह से संगठन को और मजबूत करना जरूरी था।
नए चेहरों को मिली बड़ी जिम्मेदारी
बैठक में कई पुराने संघर्षशील चेहरों को नई जिम्मेदारी दी गई। केंद्रीय उपाध्यक्ष के रूप में नान्हू सिंह, रविन्द्र वर्मा, हरेन्द्र सिंह, हरिरत्नम साहू, प्रेमचंद शर्मा और मदन महतो को चुना गया। ये सभी लंबे समय से मजदूरों के बीच काम कर रहे हैं और उनकी समस्याओं को नजदीक से समझते हैं। केंद्रीय सचिव की जिम्मेदारी सत्येन्द्र महतो, नरेश महतो, संजय मिश्रा और रामभजन महतो को सौंपी गई। संगठन के आर्थिक कामकाज की जिम्मेदारी रमेश प्रसाद को कोषाध्यक्ष के रूप में दी गई।
जिनके नाम कम दिखते हैं, लेकिन काम बड़ा होता है
केंद्रीय कमेटी में सदस्य के रूप में सुरेश राम, इन्द्रदेव राम, बिनोद कुमार, आफताब आलम, सहदेव, प्रभात कुमार और बिजय बेदिया को शामिल किया गया। संगठन के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का कहना है कि अक्सर ऐसे ही लोग जमीनी स्तर पर मजदूरों के दुख-दर्द को सुनते हैं और संघर्ष की नींव मजबूत करते हैं।
मजदूरों के साथ खड़ा संगठन
मनोनयन के समय संघ के महासचिव सतीश सिन्हा भी मौजूद थे। उन्होंने कहा कि संगठन का असली उद्देश्य पद बांटना नहीं, बल्कि खदानों में काम करने वाले उन मजदूरों को सम्मान और सुरक्षा दिलाना है, जिनके पसीने से देश को ऊर्जा मिलती है।
प्रशासन तक पहुंची मजदूरों की आवाज
बैठक के बाद मनोनयन की आधिकारिक जानकारी निदेशक एचआर सीसीएल रांची, महाप्रबंधक पी एंड आईआर रांची, डीजीपी झारखंड, क्षेत्रीय श्रमायुक्त हटिया रांची, सभी क्षेत्रों के महाप्रबंधक, क्षेत्रीय सुरक्षा पदाधिकारी और चिकित्सा पदाधिकारी सीसीएल रांची को भेज दी गई। इससे यह संकेत गया कि मजदूरों की आवाज अब सिर्फ खदानों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि दफ्तरों और नीतियों तक पहुंचेगी।
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