अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :
Pakur (Jaydev Kumar) : सुबह की हल्की धूप, गांव की कच्ची-पक्की गलियों में चहल-पहल और चेहरे पर अलग ही उत्साह। पाकुड़ के गोपीनाथपुर की यह सुबह आम दिनों से बिल्कुल अलग थी। वजह थी गांव में होने वाला विराट हिंदू सम्मेलन, जिसने न सिर्फ धार्मिक भावनाओं को जगाया, बल्कि लोगों के दिलों को भी आपस में जोड़ दिया।
कलश यात्रा में महिलाएं बनीं आस्था की पहचान
सुबह होते ही गांव की महिलाएं रंग-बिरंगे परिधानों में सिर पर कलश लेकर निकल पड़ीं। कोई मां अपने बच्चे का हाथ थामे थी, तो कोई बुजुर्ग महिला धीमे कदमों से, लेकिन चेहरे पर गहरी श्रद्धा लिए चल रही थी।
एक महिला ने मुस्कराते हुए कहा, “ऐसे मौके रोज-रोज नहीं आते, आज मन को बहुत सुकून मिल रहा है।”
कलश यात्रा के दौरान नारे गूंज रहे थे, ढोल-नगाड़ों की आवाज से पूरा गांव जाग चुका था। यह सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि एकता और अपनापन दिखाने का तरीका था।
स्वामी परमानंद महाराज की बातों में संस्कार और चिंता
मंच से जब स्वामी परमानंद महाराज ने बोलना शुरू किया, तो पंडाल में खामोशी छा गई। उनकी आवाज में सख्ती कम और चिंता ज्यादा थी।
उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति हमारी पहचान है, लेकिन आज जरूरत है इसे समझने और अगली पीढ़ी तक सही तरीके से पहुंचाने की। उनकी बातों में बच्चों के भविष्य की चिंता झलक रही थी “अगर बच्चों को संस्कार नहीं मिले, तो समाज कमजोर हो जाएगा।” उन्होंने गुरुकुल शिक्षा, पूजा-पाठ और परंपराओं को अपनाने पर जोर दिया।

मंदिर, सिर्फ पूजा की जगह नहीं
रांची से आए सामाजसेवी गोपाल जी की बातें लोगों को अतीत की याद दिला गईं। उन्होंने कहा कि पुराने समय में मंदिर समाज का सहारा हुआ करते थे। गरीब बेटियों की शादी हो या किसी बीमार का इलाज, मंदिर हमेशा आगे रहते थे। एक बुजुर्ग श्रोता ने भावुक होकर कहा, “पहले मंदिर में सिर्फ पूजा नहीं, मदद भी मिलती थी। आज वही भावना फिर से लौटनी चाहिए।”
पर्यावरण और देश के लिए जिम्मेदारी
सम्मेलन सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं रहा। मंच से पेड़ लगाने, प्लास्टिक से बचने और नदियों को साफ रखने की अपील भी की गई।
गोपाल जी ने कहा, “धर्म वही है जो प्रकृति और देश की रक्षा सिखाए।”
स्वदेशी सामान इस्तेमाल करने की बात ने खासकर युवाओं को सोचने पर मजबूर कर दिया।
बुजुर्गों की आंखों में उम्मीद, युवाओं में जोश
पंडाल में बैठे बुजुर्गों की आंखों में जहां बीते दिनों की यादें थीं, वहीं युवाओं में कुछ करने का जोश साफ दिख रहा था। एक युवा ने कहा, “ऐसे कार्यक्रम हमें अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। आज समझ आया कि धर्म सिर्फ पूजा नहीं, जिम्मेदारी भी है।”
एक सम्मेलन, कई एहसास
शाम ढलते-ढलते कार्यक्रम खत्म हुआ, लेकिन लोगों के दिलों में बातें रह गईं। यह सम्मेलन सिर्फ भाषणों का मंच नहीं था, बल्कि आस्था, संस्कृति, जिम्मेदारी और इंसानियत का संगम बन गया।
इसे भी पढ़ें : “लोगों का भरोसा टूटना नहीं चाहिए”… एसपी अजय की अधिकारियों को चेतावनी



