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Ranchi : घने जंगल, पथरीले पहाड़, खामोशी में छिपा डर और हर कदम पर मौत का साया… झारखंड के नक्सल प्रभावित इलाकों की कभी यही पहचान थी। लेकिन इसी अंधेरे के बीच 18 साल पहले एक ऐसी फौज खड़ी हुई, जिसने न सिर्फ हथियारों से, बल्कि हौसले, धैर्य और मानवीय संवेदनाओं से भी लड़ाई लड़ी। यह कहानी है झारखंड जगुआर की, एक ऐसे विशेष बल की जिसने उग्रवाद के खिलाफ जंग को सिर्फ ऑपरेशन नहीं, बल्कि मिशन बना दिया।
जंगल के बीच जन्मा भरोसा
वर्ष 2008 में जब झारखंड जगुआर का गठन हुआ, तब नक्सलवाद राज्य के बड़े हिस्से में अपनी जड़ें जमा चुका था। बूढ़ा पहाड़, सारंडा, कोल्हान और पारसनाथ जैसे इलाकों में आम लोग दो पाटों के बीच फंसे थे। एक तरफ नक्सलियों का खौफ, दूसरी ओर विकास से दूरी।
झारखंड जगुआर के जवान जब पहली बार इन इलाकों में पहुंचे, तो लोगों की आंखों में डर था, लेकिन मन में एक सवाल भी… “क्या ये भी चले जाएंगे?” समय ने जवाब दिया। जवान रुके, गांवों में बैठे, लोगों से बात की और धीरे-धीरे भरोसे की नींव रखी।
वर्दी के पीछे छिपी इंसानियत
झारखंड जगुआर सिर्फ मुठभेड़ों और गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं रहा। कई गांवों में जब सड़क नहीं थी, तो जवानों ने कंधों पर बीमारों को उठाकर अस्पताल तक पहुंचाया। कहीं स्कूल बंद मिले, तो बच्चों को पढ़ाने की कोशिश की। नक्सल प्रभावित इलाकों में रहने वाली महिलाएं आज भी बताती हैं कि कैसे पहली बार उन्हें लगा कि कोई उनकी सुरक्षा के लिए सच में खड़ा है। यह वही मानवीय पहलू है, जिसने खाकी को डर का नहीं, भरोसे का प्रतीक बनाया।

“नक्सल हिंसा में आई कमी, मजबूत नेतृत्व और प्रशिक्षण का परिणाम”
झारखंड जगुआर के 18वें स्थापना दिवस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत करने पहुंचीं डीजीपी तदाशा मिश्र ने कहा कि झारखंड जगुआर के जवानों ने यह साबित किया है कि कठिन से कठिन हालात में भी अगर संकल्प मजबूत हो, तो हालात बदले जा सकते हैं। डीजीपी ने साफ शब्दों में कहा कि राज्य में नक्सल हिंसा और नक्सलियों की संख्या में जो गिरावट आई है, वह किसी एक ऑपरेशन की वजह से नहीं, बल्कि वर्षों की सतत रणनीति, बेहतर प्रशिक्षण और मजबूत नेतृत्व का नतीजा है। उन्होंने कहा कि झारखंड जगुआर आज एक ऐसी ताकत बन चुकी है, जो उग्रवादी संगठनों को न सिर्फ जवाब दे सकती है, बल्कि उन्हें जड़ से खत्म करने की क्षमता भी रखती है।

“24 शहीदों का बलिदान, हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी”
अपने संबोधन के दौरान डीजीपी तदाशा मिश्र भावुक भी नजर आईं। उन्होंने कहा कि पिछले 18 वर्षों में 24 वीर जवानों और पदाधिकारियों ने झारखंड की शांति के लिए अपने प्राण न्योछावर किए हैं। कोई पिता था, कोई बेटा, कोई भाई। उनके घरों में आज भी उनकी तस्वीरें दीवारों पर टंगी हैं, गर्व और दर्द दोनों के साथ। ये शहीद सिर्फ झारखंड जगुआर के नहीं, पूरे राज्य के हैं। उनकी कुर्बानी हमें याद दिलाती है कि शांति की कीमत कितनी बड़ी होती है। यह कहते हुए उन्होंने शहीद परिवारों के प्रति संवेदना और सम्मान प्रकट किया।

“सिर्फ ऑपरेशन नहीं, लोगों का भरोसा जीतना भी जरूरी”
डीजीपी ने यह भी जोर देकर कहा कि झारखंड जगुआर की असली ताकत केवल हथियार और रणनीति नहीं है, बल्कि स्थानीय लोगों के साथ बना भरोसे का रिश्ता है। उन्होंने कहा कि जब कोई फोर्स गांव वालों की भाषा समझती है, उनके दर्द को महसूस करती है और जरूरत के समय साथ खड़ी होती है, तभी स्थायी शांति संभव होती है।
नेतृत्व, जो मैदान की सच्चाई जानता है
झारखंड जगुआर की इस पहचान के पीछे मजबूत नेतृत्व की बड़ी भूमिका रही है। स्थापना दिवस के अवसर पर आईजी अनूप बिरथरे ने 18 वर्षों की यात्रा को याद करते हुए कहा कि झारखंड जगुआर के जवानों ने हर चुनौती को मौके में बदला है। उनका कहना था कि चाहे पारसनाथ की ऊंची पहाड़ियां हों या सारंडा के घने जंगल, जवानों ने हर इलाके में न सिर्फ साहस दिखाया, बल्कि स्थानीय लोगों का भरोसा भी जीता। यही भरोसा नक्सल उन्मूलन की सबसे बड़ी ताकत बना।

आंकड़ों से आगे की लड़ाई
303 नक्सलियों की गिरफ्तारी और 50 उग्रवादियों का मारा जाना… ये आंकड़े बड़ी उपलब्धि जरूर हैं, लेकिन असली जीत तब महसूस होती है, जब कभी नक्सलियों के साए में जीने वाले गांवों में आज बाजार लगते हैं, बच्चे स्कूल जाते हैं और लोग बेखौफ होकर त्योहार मनाते हैं।
आज भी जारी है चुनौती
आज भी सारंडा के दुर्गम इलाकों में झारखंड जगुआर के जवान अभियान पर हैं। महीनों घर से दूर, सीमित सुविधाओं के बीच, लेकिन आंखों में एक ही सपना… झारखंड को पूरी तरह नक्सल मुक्त बनाना।
एक जवान का कहना था, “घर की याद आती है, लेकिन जब किसी गांव में डर खत्म होता दिखता है, तो वही हमारी सबसे बड़ी जीत बन जाती है।”

‘जीत ही लक्ष्य’… एक नारा नहीं, संकल्प
झारखंड जगुआर का आदर्श वाक्य “जीत ही लक्ष्य” सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि हर जवान की दिनचर्या है। यह जीत सिर्फ नक्सलियों पर नहीं, बल्कि डर, अविश्वास और वर्षों से चली आ रही पीड़ा पर है।
एक कहानी, जो अभी खत्म नहीं हुई
18 साल बाद भी यह कहानी जारी है। जंगल अब भी हैं, चुनौतियां भी हैं, लेकिन अब उनके बीच खड़ा है एक मजबूत भरोसा… झारखंड जगुआर। यह सिर्फ एक फोर्स नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए उम्मीद है, जिन्होंने वर्षों तक बंदूक की नोक पर जिंदगी जी। और शायद यही इसकी सबसे बड़ी जीत है।
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