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Home » सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: राज्यपाल बिलों को अनिश्चितकाल तक रोक नहीं सकते
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सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: राज्यपाल बिलों को अनिश्चितकाल तक रोक नहीं सकते

September 3, 2025No Comments2 Mins Read
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राज्यपाल
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New Delhi :  विधानसभा से पास बिलों पर राज्यपाल और राष्ट्रपति की मंजूरी की समयसीमा तय करने संबंधी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को लगातार सातवें दिन सुनवाई हुई। इस दौरान पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश सरकारों ने गवर्नरों के विवेकाधिकार का विरोध करते हुए कहा कि कानून बनाना विधानसभा का अधिकार है, गवर्नर सिर्फ औपचारिक प्रमुख होते हैं।

राज्यों की दलीलें

  • कपिल सिब्बल (प. बंगाल सरकार की ओर से): गवर्नर के पास बिल रोकने का अधिकार नहीं है। या तो वे उस पर हस्ताक्षर करें या राष्ट्रपति को भेजें। लगातार रोके रखना संविधान और लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है।

  • आनंद शर्मा (हिमाचल सरकार की ओर से): संघीय ढांचा भारत की ताकत है। अगर गवर्नर बिलों को अटकाते हैं तो यह केंद्र-राज्य संबंधों में टकराव पैदा करेगा।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अगुवाई वाली पांच जजों की बेंच ने कहा कि गवर्नर बिलों को अनिश्चित समय तक लंबित नहीं रख सकते। कोर्ट ने साफ किया कि राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही काम करना होगा। संविधान गवर्नर को केवल दो स्थितियों में ही विवेकाधिकार देता है—

  1. अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजने में।

  2. जब कोई बिल हाईकोर्ट की शक्तियों को प्रभावित करता है।

केंद्र का पक्ष

केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि राज्य सरकारें अनुच्छेद-32 के तहत इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटा सकतीं, क्योंकि यह मौलिक अधिकार नागरिकों के लिए हैं, राज्यों के लिए नहीं। साथ ही कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल के फैसले न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर हैं।

भाजपा शासित राज्यों की दलील

महाराष्ट्र, गोवा, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, ओडिशा और पुडुचेरी जैसे राज्यों ने कहा कि बिलों पर मंजूरी देने का अधिकार राज्यपाल और राष्ट्रपति का है, सुप्रीम कोर्ट इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

कोर्ट का सवाल केंद्र से

सीजेआई ने केंद्र से पूछा – “अगर कोई गवर्नर 2020 से 2025 तक बिलों को रोककर रखे, तो क्या सुप्रीम कोर्ट बेबस होकर बैठा रहेगा? क्या अदालत अपनी जिम्मेदारी छोड़ सकती है?”

पृष्ठभूमि

यह विवाद तमिलनाडु से शुरू हुआ था, जहां राज्यपाल ने विधानसभा से पास कई बिलों को रोके रखा। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल 2025 को आदेश दिया था कि राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है और राष्ट्रपति को भेजे गए बिलों पर तीन महीने के भीतर फैसला लेना होगा।

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