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Pakur (Jaydev Kumar) : पाकुड़ के चापाडांगा का शांत सा प्रशिक्षण केंद्र कुछ अलग ही चमक रहा था। बाल दिवस का मौका था और मंच पर कदम रखते ही हर बच्ची जैसे अपने सपनों को आकार दे रही थी। चेहरे पर हल्का संकोच, लेकिन आंखों में पूरा आत्मविश्वास। यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उन बच्चियों की दुनिया थी, जो सीखने और आगे बढ़ने का हौसला अपने भीतर धीरे-धीरे मजबूत कर रही हैं।
छोटी-छोटी कोशिशों के बड़े सपने
फेस संस्था की बालिका शिक्षा और किशोर कौशल विकास परियोजना से जुड़ी छात्राएं महीनों से इस दिन का इंतजार कर रही थीं। किसी ने नृत्य की प्रैक्टिस की थी, किसी ने भाषण को बार-बार दोहराया, तो किसी ने अपने मॉडल को कई शामें देकर तैयार किया। जब वे मंच पर आईं, तो उनकी हर प्रस्तुति में श्रम और उत्साह दोनों साफ दिख रहे थे। संगीत और नृत्य से शुरू हुआ कार्यक्रम धीरे-धीरे एक उत्सव में बदल गया। बच्चियों की मुस्कान जैसे बता रही थी कि मौका मिल जाए तो उनकी उड़ान कितनी ऊंची जा सकती है।

मॉडल में झलकता जज्बा और जिज्ञासा
एक तरफ डिजिटल लर्निंग का मॉडल था, जिसे बनाते समय बच्चों ने पहली बार टैब और कंप्यूटर को गंभीरता से समझा था। दूसरी तरफ सिलाई क्लस्टर की बच्चियों ने बताया कि एक सुई और धागा भी किसी लड़की का आत्मनिर्भर बनने का रास्ता खोल सकता है। स्वास्थ्य और अंग्रेजी पर बने मॉडल उनकी समझ और तैयारी को मजबूत बताते थे। बच्चियों ने बिना घबराए हर मॉडल का उद्देश्य और इसका उपयोग समझाया। दर्शकों को यह सिर्फ प्रस्तुति नहीं लगी, बल्कि लगा जैसे यह उनकी अपनी जिंदगी का हिस्सा हो।
डीसी ने देखा क्षमता, बच्चों ने पाया आत्मविश्वास
मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे डीसी पाकुड़ मनीष कुमार पूरे समय बच्चों की गतिविधियों को ध्यान से देखते रहे। एक-एक मॉडल पर उनकी प्रतिक्रिया बच्चियों को और प्रोत्साहित कर रही थी। उन्होंने कहा कि बच्चियों को इतना बेझिझक होकर अपने कौशल दिखाते देखना खुद में एक सकारात्मक संकेत है। उनकी बातों से साफ था कि प्रशासन बच्चों की इस पहल को एक मजबूत आधार मानता है और जरूरी सहयोग देने को तैयार है।
समाज को बदलने की छोटी शुरुआत
फेस की सचिव रितू पांडेय ने कार्यक्रम के अंत में कहा कि संस्था का उद्देश्य सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि बच्चों को वह माहौल देना है जहां वे खुद को समझ सकें, अपनी रुचियों को दिशा दे सकें और आत्मविश्वास हासिल कर सकें। मेहबूब आलम, प्रिया दास, निकिता झा, सहादत, देवज्योति और अन्य कार्यकर्ताओं की मेहनत इस कार्यक्रम की हर छोटी-बड़ी व्यवस्था में दिख रही थी। सभी जानते थे कि यह सिर्फ एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि उन बच्चियों के लिए पहचान, हिम्मत और उम्मीद का मौका है।
एक दिन, जिसने बदल दी कई चेहरों की चमक
कार्यक्रम खत्म होने तक शाम ढल चुकी थी। लेकिन मंच से उतरती बच्चियों के चेहरे पर एक अलग रोशनी थी। यह रोशनी उस विश्वास की थी, जो धीरे-धीरे उनके भीतर जाग रहा है। शायद यही वह बीज है जिससे आने वाले दिनों में एक मजबूत और सशक्त समाज की शुरुआत होगी।
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