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Gumla (Shivam Keshri) : शाम ढल रही थी। गांव के आंगन में चूल्हे की आंच धीमी-धीमी जल रही थी। खेत से तोड़ी गई हरी मकई को भूनने की तैयारी चल रही थी। घर में रोजमर्रा की तरह सादगी भरा माहौल था। किसी को क्या पता था कि यह साधारण सा दिन एक परिवार की जिंदगी हमेशा के लिए बदल देगा। मालम गांव की रहने वाली प्रियंका एक्का उस दिन बस इतना कहकर घर से निकली थी… “थोड़ी देर में आती हूं।” लेकिन वह लौटकर कभी नहीं आई।
एक भरोसा, जिसने सब कुछ छीन लिया
प्रियंका पढ़ी-लिखी नहीं थी, लेकिन सपने जरूर देखती थी। बेहतर जिंदगी, खुशहाल परिवार और अपने माता-पिता का सहारा बनने का सपना। इसी मासूमियत का फायदा उठाया गांव के ही एक युवक ने, जिसने रांची घुमाने का लालच दिया और उसे अपने साथ ले गया। शुरुआत में प्रियंका फोन पर बात करती रही। मां को भरोसा दिलाती रही कि वह ठीक है। लेकिन कुछ ही दिनों बाद फोन हमेशा के लिए खामोश हो गया। परिवार को तब एहसास हुआ कि कुछ बहुत गलत हो चुका है।
राजस्थान में बेचे जाने का दर्दनाक सच
धीरे-धीरे जो बातें सामने आईं, उन्होंने पूरे गांव को झकझोर दिया। परिजनों का आरोप है कि प्रियंका को राजस्थान ले जाकर बेच दिया गया। जिस बेटी को मां ने बड़े अरमानों से पाला था, उसे किसी और के हवाले कर दिया गया। इस सदमे ने पूरे परिवार को तोड़ दिया, लेकिन सबसे ज्यादा असर पड़ा उसके पिता अनिल एक्का पर।
लकवाग्रस्त पिता की लाचार लड़ाई
अनिल एक्का पहले से ही लकवाग्रस्त हैं। चलना-फिरना उनके लिए आसान नहीं, लेकिन बेटी की तलाश में उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। सहारे के सहारे वह कई बार चैनपुर थाना पहुंचे। हर बार एक ही जवाब मिला… “जांच चल रही है।” न कोई ठोस कार्रवाई, न कोई उम्मीद की किरण। “मैं थक गया हूं साहब… मेरी बेटी को ढूंढ दीजिए,” यह कहते हुए उनकी आंखें भर आती हैं।
मां की आंखों में आज भी बिटिया की तस्वीर
प्रियंका की मां शालोमि एक्का आज भी उस आखिरी फोन कॉल को याद करती हैं। “मां, मेरे जूते संभालकर रखना…” बस यही शब्द थे, जो बेटी ने आखिरी बार कहे थे। मां ने आज भी जूते संभालकर रखे है, जैसे बेटी कभी भी लौट आएगी और उन्हें पहनकर फिर बाहर निकल जाएगी।
एक नहीं, कई कहानियां
गांव वालों का कहना है कि यह कोई अकेली घटना नहीं है। चैनपुर और आसपास के इलाकों में मानव तस्करी का जाल फैला हुआ है। भोली-भाली आदिवासी लड़कियों को बेहतर जिंदगी का सपना दिखाकर दूसरे राज्यों में बेच दिया जाता है। कई बार वे जबरन गलत कामों में धकेल दी जाती हैं। फिर भी, न तो तस्करों पर शिकंजा कसता है और न ही पीड़ित परिवारों को न्याय मिलता है।
एक सवाल, जो अब भी बाकी है
प्रियंका की कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि उन सैकड़ों बेटियों की है जो हर साल ऐसे ही गायब हो जाती हैं। सवाल यह है कि क्या किसी की बेटी वापस लौटेगी? या फिर कई मामलों की तरह यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
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