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Pakur (Jaydev Kumar) : मकर संक्रांति की ठंडी सुबह थी। हल्की धूप निकल चुकी थी और श्री श्री गोपाल गौशाला के आंगन में चहल-पहल शुरू हो गई थी। कहीं गायों की धीमी रंभाहट थी, तो कहीं चूल्हे पर चढ़ते दही-चूड़ा की खुशबू। यह कोई साधारण दिन नहीं था। यह दिन था आस्था, सेवा और इंसानियत के संगम का।
जब मेहमान नहीं, अपने जैसे पहुंचे लुत्फल हक
इसी माहौल में समाजसेवी लुत्फल हक गौशाला पहुंचे। न कोई दिखावा, न कोई औपचारिकता। उन्होंने सबसे पहले गौशाला की मिट्टी को देखा, गायों के पास जाकर खड़े हुए, उनके सिर पर हाथ फेरा और कर्मचारियों से हालचाल पूछा। उनकी नजरें गायों के बाड़े, चारे की व्यवस्था और साफ-सफाई पर रुकती रहीं। यह कोई रस्मी निरीक्षण नहीं था, बल्कि एक ऐसे इंसान की चिंता थी, जो व्यवस्था से ज्यादा जरूरत को समझता है।
दही-चूड़ा की थाली और दिल से निकला फैसला
कार्यक्रम शुरू हुआ। दही-चूड़ा परोसा गया। लोग बैठे, बातें हुईं, हंसी गूंजी। लेकिन लुत्फल हक के चेहरे पर एक अलग ही गंभीरता थी। उन्होंने कहा, “यहां की व्यवस्था देखकर मन खुश हो गया। गायों की सेवा सच्चे मन से हो रही है।” और फिर वहीं, बिना किसी मंचीय घोषणा के, उन्होंने वह बात कह दी जिसने पूरे माहौल को भावुक कर दिया। “मैं इस गौशाला को उत्कृष्ट नस्ल की दस गाय दूंगा।” कुछ पल के लिए वहां सन्नाटा छा गया, फिर तालियों की आवाज गूंज उठी।
सिर्फ गाय नहीं, जिम्मेदारी भी
लुत्फल हक ने यहीं बात खत्म नहीं की। उन्होंने हरे चारे की चिंता जताई। पूछा कि गायों को नियमित पौष्टिक चारा कैसे मिलता है। उन्होंने कहा, “अगर जरूरत पड़ी तो जमीन तलाश करेंगे, ताकि इन बेजुबानों को कभी भूखा न रहना पड़े।” उनके शब्दों में दान की नहीं, जिम्मेदारी की झलक थी।

सम्मान हुआ, लेकिन असली पहचान सेवा
गुलदस्ता, शॉल और मोमेंटो से उनका स्वागत किया गया। लोग उनके समाजसेवा के किस्से सुनाने लगे। कैसे उन्होंने पाकुड़ का नाम देश और विदेश तक पहुंचाया। कैसे वे हर जरूरतमंद के लिए खड़े रहते हैं। लेकिन जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने बस इतना कहा, “अगर किसी की तकलीफ कम हो जाए, तो वही सबसे बड़ा सम्मान है।”
गौशाला की दीवारों में बस गई एक उम्मीद
कार्यक्रम खत्म हुआ, लोग लौटने लगे। लेकिन गौशाला की दीवारों में उस दिन एक नई उम्मीद बस गई थी। गायों के बाड़े में जैसे भविष्य की आहट थी। दस नई जिंदगियों की, जो जल्द यहां आएंगी। सेवा के एक नए अध्याय की। मकर संक्रांति का यह दिन सिर्फ एक त्योहार नहीं रहा। यह दिन बन गया इंसानियत की मिसाल।
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