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Godda : सुबह की हल्की धूप में जब गोड्डा के आदिवासी गांव जागे, तो हवा में कुछ अलग सा अपनापन था। घरों के आंगन साफ थे, मिट्टी की दीवारें रंगों से बोल रही थीं और बच्चे उत्सुकता से बुजुर्गों के आसपास मंडरा रहे थे। मौका था सोहराय पर्व का, जो यहां सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि जीवन को धन्यवाद कहने का तरीका है। 9 से 18 जनवरी 2026 के बीच अदाणी फाउंडेशन के सहयोग से यह पर्व महागामा, बोआरीजोर, ठाकुरगंगटी और गोड्डा प्रखंड के नौ गांवों में मनाया गया। करीब एक हजार से अधिक ग्रामीण इस आयोजन का हिस्सा बने। किसी के लिए यह बचपन की यादें थीं, तो किसी के लिए अपनी पहचान को फिर से महसूस करने का मौका।
जब पशु परिवार का हिस्सा बनते हैं
सोहराय का असली भाव पशुधन की पूजा में नजर आया। गाय, बैल और बकरियों को नहलाया गया, सजाया गया और उनके सामने दीप जलाए गए। कई बुजुर्ग कहते हैं कि इन्हीं पशुओं के सहारे उनका घर चलता है। पूजा के वक्त हाथ जोड़ते लोगों के चेहरों पर श्रद्धा और आंखों में अपनापन साफ दिखा। यह दृश्य बताता है कि यहां पशु सिर्फ साधन नहीं, परिवार का हिस्सा हैं।
दीवारों पर उतरती पीढ़ियों की कहानी
महिलाएं घरों की दीवारों पर सोहराय चित्र बना रही थीं। किसी चित्र में खेत, किसी में जंगल और कहीं पशु। एक मां अपनी बेटी का हाथ पकड़कर रंग भरना सिखा रही थी। वह कहती है कि यह कला उसकी मां ने उसे सिखाई थी। अब वही परंपरा आगे बढ़ रही है। इन दीवारों पर सिर्फ चित्र नहीं, पीढ़ियों की कहानी उतर रही थी।
जब पूरा गांव एक साथ थिरका
शाम ढलते ही मांदर और ढोल की आवाज गांव के हर कोने में गूंजने लगी। युवक युवतियां पारंपरिक परिधानों में नृत्य कर रहे थे। नृत्य की हर चाल में खेती, शिकार और मौसम का असर झलक रहा था। बुजुर्ग किनारे बैठकर ताल मिलाते रहे। उनके चेहरे पर सुकून था, जैसे गांव की आत्मा फिर से जाग गई हो।

संस्कृति के साथ आगे बढ़ने की उम्मीद
अदाणी फाउंडेशन के इस आयोजन ने ग्रामीणों को यह भरोसा दिया कि उनकी संस्कृति आज भी मायने रखती है। युवाओं का कहना था कि ऐसे कार्यक्रम उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ते हैं और यह समझ देते हैं कि आधुनिकता के साथ परंपरा को कैसे संभाल कर रखा जाए।
सोहराय, जो रिश्तों को मजबूत करता है
सोहराय का यह उत्सव कुछ दिनों का आयोजन भर नहीं था। यह गांव के रिश्तों को मजबूत करने, प्रकृति के प्रति आभार जताने और आने वाली पीढ़ियों को अपनी पहचान सौंपने का प्रयास था। गोड्डा के इन गांवों में सोहराय ने यह एहसास कराया कि जब इंसान, प्रकृति और परंपरा साथ चलते हैं, तब समाज सच में समृद्ध होता है।
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