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Home » डायन बताकर उजाड़ दी जाती हैं जिंदगियां… अब कानून के रखवाले बन रहे ढाल
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डायन बताकर उजाड़ दी जाती हैं जिंदगियां… अब कानून के रखवाले बन रहे ढाल

April 25, 2026No Comments5 Mins Read
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Ranchi (Pawan Thakur) : किसी गांव में अगर कोई महिला अकेली रह रही हो, अगर वह विधवा हो, अगर उसके पास थोड़ी जमीन हो, या फिर उसने किसी अन्याय के खिलाफ आवाज उठा दी हो, तो कई बार उसे “डायन” कह देना आसान समझ लिया जाता है। इसके बाद शुरू होता है अपमान, मारपीट, सामाजिक बहिष्कार और कई बार मौत तक का सफर। झारखंड में आज भी ऐसी कहानियां खत्म नहीं हुई हैं। यही दर्द, यही सच्चाई और यही सवाल शनिवार को रांची के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ऑडिटोरियम में आयोजित एक बड़े कोलोक्वियम के केंद्र में रहा, जहां महिलाओं के खिलाफ अपराध, खासकर डायन-बिसाही जैसी कुप्रथा पर गंभीर मंथन हुआ। यह कार्यक्रम झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (JHALSA) और महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग, झारखंड सरकार की ओर से आयोजित किया गया।

मंच पर कानून के रखवाले थे, सामने पीड़ा की सच्चाई

कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एवं राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस विक्रम नाथ मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थे। उनके साथ सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस महेश शरदचंद्र सोनक और हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद भी मौजूद रहे। लेकिन इस कार्यक्रम की असली ताकत सिर्फ मंच पर बैठे बड़े नाम नहीं थे, बल्कि वे महिलाएं थीं, जिनकी जिंदगी ने इस विषय को सिर्फ बहस नहीं, बल्कि एक जिंदा सच्चाई बना दिया। उनकी आंखों में दर्द था, लेकिन उम्मीद भी थी कि शायद अब व्यवस्था सिर्फ सुनने नहीं, बदलने भी लगे।

“डायन” कहकर सबसे पहले छीना जाता है इंसान होने का हक 

कार्यक्रम के दौरान बार-बार यह बात सामने आई कि डायन-बिसाही सिर्फ अंधविश्वास नहीं है। यह महिलाओं के खिलाफ हिंसा का संगठित रूप है। कई गांवों में आज भी किसी महिला को बीमारी, फसल खराब होने, पारिवारिक झगड़े या जमीन विवाद के बहाने डायन घोषित कर दिया जाता है। इसके बाद उसका सामाजिक बहिष्कार, सार्वजनिक अपमान, मारपीट और कभी-कभी हत्या तक हो जाती है। मुख्य न्यायाधीश महेश शरदचंद्र सोनक ने साफ कहा कि यह केवल अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता और नियंत्रण का चेहरा है। उन्होंने कहा, “सिर्फ सजा देना न्याय नहीं है। पीड़िता को सम्मान के साथ दोबारा समाज में जीने का अधिकार मिलना भी उतना ही जरूरी है।”

अदालत से पहले गांव तक पहुंचना होगा न्याय

न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद ने कहा कि कई बार पीड़ित महिला अदालत तक पहुंच ही नहीं पाती। डर, गरीबी, सामाजिक दबाव और जानकारी की कमी उसे चुप करा देती है। उन्होंने कहा कि विधिक सेवा संस्थाओं की जिम्मेदारी सिर्फ अदालत में वकील देना नहीं, बल्कि गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करना भी है। उन्होंने झालसा की ओर से चलाए जा रहे प्रोजेक्ट सुरक्षा और प्रोजेक्ट बाल सुरक्षा का जिक्र करते हुए कहा कि महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को अब जमीनी स्तर पर मजबूत करना होगा।

संविधान किताब में नहीं, जिंदगी में दिखना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 17, 21 और 39A का जिक्र करते हुए कहा कि कागज पर बराबरी और जमीन पर बराबरी, दोनों अलग बातें हैं। उन्होंने कहा कि डायन प्रथा जैसी घटनाएं बताती हैं कि महिलाओं के लिए न्याय अभी भी अधूरा है। उन्होंने झारखंड विचक्राफ्ट प्रिवेंशन एक्ट और एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून के बेहतर क्रियान्वयन पर जोर देते हुए कहा कि पीड़िता को सिर्फ कानूनी नहीं, मानसिक और सामाजिक सहारा भी मिलना चाहिए।

“न्याय तब पूरा होगा, जब वह फिर से मुस्कुरा सके”

मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की यह बात पूरे कार्यक्रम का सबसे मजबूत संदेश बन गई। उन्होंने कहा, “न्याय सिर्फ सजा का नाम नहीं है। न्याय तब पूरा होता है, जब पीड़िता फिर से सम्मान के साथ जी सके, जब वह डर से नहीं, भरोसे से आगे बढ़े।” उन्होंने कहा कि डायन प्रथा महिलाओं के खिलाफ सबसे क्रूर हिंसा में से एक है, क्योंकि इसमें एक महिला से उसका नाम, उसका सम्मान और उसका समाज सब छीन लिया जाता है।

मदद सिर्फ भाषण में नहीं, हाथों में भी दिखी

कार्यक्रम के दौरान सिर्फ चर्चा ही नहीं हुई, बल्कि कई ठोस पहल भी शुरू की गईं। पश्चिमी सिंहभूम के चक्रधरपुर में अनुमंडलीय विधिक सेवा समिति का वर्चुअल उद्घाटन किया गया। एनआई एक्ट मामलों के लिए विशेष लोक अदालत की शुरुआत हुई। JHALSA चैटबॉट लॉन्च किया गया और 90 दिन का जागरूकता अभियान भी शुरू किया गया। महिला लाभुकों को योजनाओं का लाभ दिया गया और अपराध की पीड़ित महिलाओं को आर्थिक सहायता भी प्रदान की गई। यह दृश्य उन महिलाओं के लिए खास था, जिनके लिए न्याय अक्सर सिर्फ कागजों में रह जाता है।

तीन सत्र, एक ही सवाल : महिलाओं को सुरक्षित कैसे बनाया जाए

कोलोक्वियम में तीन तकनीकी सत्र भी हुए। पहले सत्र में घरेलू हिंसा, बाल विवाह, मानव तस्करी और महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुड़े कानूनों पर चर्चा हुई। दूसरे सत्र में झारखंड में डायन प्रथा रोकने के लिए पुलिस, प्रशासन और समाज की संयुक्त जिम्मेदारी पर बात हुई। तीसरे सत्र में पीड़ित महिलाओं को मुआवजा, गवाह सुरक्षा, मानसिक सहयोग और पुनर्वास की मजबूत व्यवस्था बनाने पर जोर दिया गया।

असली लड़ाई अदालत से बाहर

इस पूरे कार्यक्रम का सबसे बड़ा संदेश यही था कि महिलाओं के खिलाफ अपराध की लड़ाई सिर्फ अदालतों में नहीं जीती जाएगी। यह लड़ाई गांव की चौपाल, घर की सोच, समाज की मानसिकता और प्रशासन की संवेदनशीलता में जीती जाएगी। जब तक किसी महिला को “डायन” कहकर अपमानित करना आसान रहेगा, तब तक कानून अधूरा रहेगा। लेकिन रांची में शनिवार को जो आवाज उठी, उसने यह जरूर बताया कि अब चुप्पी टूट रही है। और शायद यहीं से बदलाव की शुरुआत भी होती है।

इसे भी पढ़ें : खिलौनों की उम्र में कोख का बोझ, बेघर सिसकती बच्ची के आंसू पोंछ गया डालसा

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