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Home » फैक्ट्री गेट पर चीखती रही मां और बीवी, टकटकी लगाये निहारते रहे ग्रिसा-अनमोल
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फैक्ट्री गेट पर चीखती रही मां और बीवी, टकटकी लगाये निहारते रहे ग्रिसा-अनमोल

August 22, 2026No Comments5 Mins Read
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Ramgarh (Dharmendra Pradhan) : फैक्ट्री के गेट के बाहर लोगों की भीड़ थी। किसी के चेहरे पर गुस्सा था, किसी की आंखों में आंसू। कोई हादसे की वजह पूछ रहा था तो कोई जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग कर रहा था। लेकिन इस शोर के बीच एक कोना ऐसा भी था, जहां दो मासूम बच्चे चुपचाप अपनी मां और दादी को रोते हुए देख रहे थे।

दो साल की ग्रिसा और पांच महीने का अनमोल शायद अभी मौत का मतलब नहीं समझते। उन्हें बस इतना पता है कि घर में आज सब रो क्यों रहे हैं और उनके पापा कहां हैं। बच्चों की आंखें बार-बार भीड़ में किसी अपने चेहरे को तलाश रही थीं। शायद उन्हें उम्मीद थी कि थोड़ी देर बाद पापा आएंगे, उन्हें गोद में उठाएंगे और कहेंगे कि चलो घर। लेकिन इस बार ऐसा नहीं होना था।

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मां छिन्नमस्तिका सीमेंट एंड इस्पात प्राइवेट लिमिटेड प्लांट में हुए हादसे ने विनीत कुमार महतो के परिवार की पूरी दुनिया ही बदल दी। हादसे में जान गंवाने वाले तीन इंजीनियरों में विनीत भी शामिल थे। वह अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य थे। उनके जाने के साथ सिर्फ एक जिंदगी खत्म नहीं हुई, बल्कि एक परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी, बच्चों के सपने और आने वाले कल की उम्मीदें भी अचानक अनिश्चित हो गईं।

मां की गोद में सिर रखकर रोती रही पत्नी, देखते रहे मासूम

जब विनीत के परिजनों को हादसे की खबर मिली तो वे भागते हुए फैक्ट्री गेट पहुंचे। वहां पहुंचते ही उनकी दुनिया जैसे थम गई। पत्नी ममता देवी अपने पति को खोने का सदमा सह नहीं पा रही थी। वह बार-बार रोते-रोते बेसुध हो रही थीं। मां की हालत भी कुछ ऐसी ही थी। जिस बेटे से घर चलता था, उसी बेटे के दर्दनाक मौत की खबर ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। लोग उन्हें संभाल रहे थे। कोई पानी दे रहा था, कोई ढांढस बंधा रहा था। लेकिन कुछ दुख ऐसे होते हैं, जिनके सामने हर शब्द छोटा पड़ जाता है।

इसी बीच ग्रिसा और अनमोल अपनी मां और दादी को देख रहे थे। बच्चों की समझ में शायद यह नहीं आ रहा था कि आखिर सभी लोग क्यों रो रहे हैं। उनके लिए तो पापा सुबह घर से निकले थे। जैसे हर दिन निकलते थे। फर्क सिर्फ इतना था कि आज उनके लौटने का इंतजार कुछ ज्यादा लंबा था। बच्चों की वह खामोशी वहां मौजूद हर व्यक्ति को भीतर तक झकझोर रही थी। एक तरफ मां और पत्नी की चीखें थीं, दूसरी तरफ दो मासूमों की आंखें थीं, जो बिना कुछ कहे जैसे एक ही सवाल पूछ रही थीं, पापा कब आएंगे?

जिस घर में बच्चों की आवाज गूंजती थी, वहां अब सन्नाटा है

विनीत के परिवार के लिए बीता दिन बाकी दिनों जैसा ही शुरू हुआ होगा। घर में बच्चों की आवाजें रही होंगी। रोजमर्रा की बातें हुई होंगी। विनीत काम पर गए होंगे और परिवार को भरोसा रहा होगा कि शाम को वह वापस घर आएंगे। किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि कुछ घंटों बाद वही घर एक ऐसे इंतजार में बदल जाएगा, जिसका कोई अंत नहीं है।

इकलौते कमाने वाले की मौत का दर्द सिर्फ भावनाओं तक सीमित नहीं रहता। उसके साथ परिवार के सामने जिंदगी चलाने का सवाल भी खड़ा हो जाता है। बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च, मां की जिम्मेदारी और पत्नी की पूरी जिंदगी अब विनीत के बिना आगे बढ़नी है।

ग्रिसा अभी सिर्फ दो साल की है। उसे शायद अपने पिता की कमी को समझने में अभी वक्त लगेगा। अनमोल सिर्फ़ पांच माह का है। वह आने वाले दिनों में पूछेगा कि पापा कब आएंगे। शायद वह दरवाजे की तरफ देखेगा। शायद किसी बाइक या कदमों की आहट सुनकर उसे लगेगा कि पापा आ गए। लेकिन धीरे-धीरे उसे सच्चाई समझ में आएगी। और उस दिन शायद उसके छोटे से मन में यह सवाल उठेगा कि आखिर उसके पापा उसे छोड़कर क्यों चले गए।

फैक्ट्री के बाहर आंसुओं के साथ उठी आवाज

हादसे के बाद सिर्फ परिवार ही नहीं टूटा, बल्कि पूरे इलाके में गुस्सा भी देखने को मिला। सैकड़ों लोग फैक्ट्री गेट के बाहर जमीन पर बैठ गए। लोगों का कहना था कि मजदूरों और इंजीनियरों की जिंदगी के साथ लापरवाही नहीं होनी चाहिए।

परिजनों और स्थानीय लोगों ने मौके पर उपायुक्त, प्रदूषण विभाग और श्रम विभाग के अधिकारियों को बुलाने की मांग की। उनका आरोप है कि फैक्ट्री प्रबंधन की ओर से सुरक्षा मानकों को लेकर पर्याप्त गंभीरता नहीं बरती जाती। लोगों का कहना है कि अगर सुरक्षा व्यवस्था ठीक होती तो शायद कई परिवारों को आज यह दिन नहीं देखना पड़ता।

मौके पर पतरातू के सीओ मनोज चौरसिया के अलावा बरकाकाना और रामगढ़ थाना की पुलिस टीम मौजूद रही। पुलिस की मौजूदगी में स्थिति को संभालने की कोशिश की गई, लेकिन परिजनों का दर्द और लोगों का गुस्सा साफ नजर आ रहा था।

यह सिर्फ तीन मौतों की खबर नहीं है

कागज पर यह खबर शायद कुछ पंक्तियों में लिखी जा सकती है। तीन इंजीनियरों की मौत, फैक्ट्री में हादसा, लोगों का विरोध और जांच की मांग। लेकिन इन पंक्तियों के पीछे उन परिवारों की पूरी जिंदगी छिपी है, जिनके घर का एक सदस्य अचानक हमेशा के लिए चला गया।

विनीत की कहानी भी इसी दर्द का हिस्सा है। उनके लिए शायद फैक्ट्री रोजी-रोटी का जरिया थी। परिवार के लिए वह खुद एक पूरी दुनिया थे। अब उनकी मां बेटे के बिना रहेंगी, पत्नी पति के बिना और दो बच्चे पिता के बिना बड़े होंगे।

फैक्ट्री गेट के बाहर जब भीड़ अपने सवालों के जवाब मांग रही थी, उसी भीड़ के बीच दो मासूम चेहरे चुप थे। उन्हें न सुरक्षा मानकों का पता था, न जांच का, न जिम्मेदारी तय होने का। उन्हें सिर्फ अपने पापा की जरूरत थी। एक तरफ लोगों की भीड़ इंसाफ की मांग कर रही थी और दूसरी तरफ दो बच्चे बिना कुछ कहे अपने पिता का इंतजार कर रहे थे। उस इंतजार का जवाब अब किसी के पास नहीं है।

इसे भी पढ़ें : आधी रात टर्बाइन ब्लास्ट से दहला सीमेंट प्लांट, 3 इंजीनियरों की दर्दनाक मौत

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