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Ramgarh (Dharmendra Pradhan) : गांव की पगडंडियों पर किसी सहारे के बिना चलना क्या होता है, यह वही समझ सकता है जिसके पैर साथ नहीं देते। या फिर उस सन्नाटे का दर्द, जिसे सिर्फ वही महसूस करता है जिसके कान दुनिया की आवाजें नहीं सुन पाते। पतरातू और उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में ऐसे कई चेहरे हैं, जिनके सपने बंद कमरों और टूटी चारपाइयों तक सिमट कर रह गए थे। लेकिन अब इन चेहरों पर मुस्कान लौटने की एक नई उम्मीद जागी है। PVUNL यानी पतरातू विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड और दिव्यांगजनों के लिए उपकरण बनाने वाली देश की प्रमुख संस्था एलिम्को ने मिलकर एक ऐसा कदम उठाया है, जो आने वाले दिनों में सैकड़ों जिंदगियों की तस्वीर बदलने जा रहा है।
चौखट लांघकर समाज की मुख्यधारा से जुड़ेंगे लोग
अक्सर देखा जाता है कि ग्रामीण इलाकों में जानकारी या पैसों की कमी के कारण जरूरतमंद दिव्यांगों को आधुनिक उपकरण नहीं मिल पाते। वे उम्रभर अपनों पर निर्भर रहने को मजबूर हो जाते हैं। इसी मजबूरी को खत्म करने के लिए PVUNL के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एके सहगल, मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. शिप्रा रानी और एचआर हेड जियाउर रहमान की मौजूदगी में एलिम्को के साथ एक अहम समझौता किया गया। इस साझेदारी का सीधा मकसद यह है कि इलाके का कोई भी दिव्यांग खुद को अलग-थलग या लाचार न समझे। कंपनी का मानना है कि जब इन लोगों को जरूरी साधन मिल जाएंगे, तो वे न केवल अपनी चौखट पार करेंगे बल्कि समाज में बराबरी के साथ सिर उठाकर चल सकेंगे।
दरवाजे पर पहुंचेगी डॉक्टरों की टीम, होगा सटीक आकलन
इस योजना को जमीन पर उतारने के लिए पीवीयूएनएल जल्द ही पतरातू और आसपास की पंचायतों में विशेष जांच और आकलन शिविर लगाने जा रहा है। इन शिविरों में डॉक्टरों और विशेषज्ञों की पूरी टीम मौजूद रहेगी। वे हर व्यक्ति की शारीरिक स्थिति की बारीकी से जांच करेंगे और यह तय करेंगे कि किसे किस तरह के साधन की जरूरत है। किसी को बनावटी हाथ या पैर चाहिए, किसी को ट्राईसाइकिल या व्हीलचेयर की दरकार है, या फिर किसी बुजुर्ग-बच्चे को सुनने की मशीन की जरूरत है, इसका पूरा ब्योरा कैंप में ही तैयार किया जाएगा।
उपकरण सिर्फ सहारा नहीं, स्वाभिमान की शुरुआत
जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद चिन्हित किए गए सभी लोगों को पूरी तरह निशुल्क आधुनिक सहायक उपकरण दिए जाएंगे। इस पहल की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह सिर्फ सामान बांटने तक सीमित नहीं है। असल में यह कोशिश उन लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की है जो अब तक छोटे-छोटे कामों के लिए भी दूसरों का मुंह ताकते थे। हाथ में बैसाखी या पैरों में ट्राईसाइकिल आने के बाद वे न सिर्फ अपनी मर्जी से कहीं आ-जा सकेंगे, बल्कि छोटे-मोटे कामकाज करके अपने परिवार का सहारा भी बन सकेंगे। पीवीयूएनएल की यह कोशिश दिखाती है कि अगर नीयत साफ हो, तो कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के जरिए किसी की बेरंग जिंदगी में भी नए रंग भरे जा सकते हैं।
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