अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :
News Samvad : विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दुनिया के सामने उभर रहे खाद्य, ईंधन और उर्वरक संकट को लेकर चिंता जताई है। सितंबर 2026 में एशिया सोसाइटी के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि दुनिया ऐसे दौर में पहुंच रही है, जहां युद्ध, सप्लाई रूट में रुकावट और मौसम में बड़े बदलाव एक साथ खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने खास तौर पर काला सागर से अनाज की आवाजाही, पश्चिम एशिया से उर्वरक आपूर्ति और मजबूत होते अल नीनो का जिक्र किया।
मौजूदा हालात को देखें तो चिंता केवल भविष्य की नहीं है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन यानी WMO के मुताबिक 2026 में अल नीनो तेजी से मजबूत हो रहा है और फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना करीब 100 प्रतिशत है। संगठन का कहना है कि इसका असर अलग-अलग देशों में बारिश, तापमान, सूखे और बाढ़ के रूप में अलग-अलग हो सकता है।
काला सागर और होर्मुज में हलचल तो दुनिया की थाली तक पहुंचेगा असर
दुनिया के खाद्यान्न बाजार में रूस और यूक्रेन की बड़ी भूमिका है। काला सागर क्षेत्र में युद्ध और बंदरगाहों से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों के कारण अनाज की सप्लाई प्रभावित होने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसका सीधा असर उन देशों पर पड़ता है जो गेहूं, मक्का, सूरजमुखी तेल और दूसरे कृषि उत्पादों के आयात पर निर्भर हैं। इसके साथ पश्चिम एशिया का संकट उर्वरक और ऊर्जा की सप्लाई को प्रभावित करता है। खेती के लिए यूरिया, डीएपी, अमोनिया और दूसरे उर्वरकों की जरूरत होती है। इनकी कीमत या उपलब्धता में बड़ी बाधा आने पर किसानों की लागत बढ़ती है और कुछ जगहों पर उर्वरक का इस्तेमाल कम हो सकता है। इससे अगली फसल का उत्पादन प्रभावित होने का जोखिम बढ़ता है।
भारत भी इस वैश्विक सप्लाई चेन से अलग नहीं है। हालांकि सरकार ने पश्चिम एशिया में तनाव के दौरान उर्वरकों की सप्लाई बनाए रखने के लिए दूसरे देशों से खरीद बढ़ाने और आयात के रास्ते विविध बनाने की कोशिश की है। जुलाई 2026 में सरकार ने बताया था कि उर्वरक और कच्चा माल लेकर कई जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य पार कर भारत पहुंच रहे हैं। सरकार ने यह भी कहा कि दूसरे देशों से आपूर्ति के नए स्रोत बनाए जा रहे हैं। यानी भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल सिर्फ खाद की कीमत नहीं है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल, गैस, माल ढुलाई और बीमा की लागत लगातार बढ़ती है तो सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ सकता है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में ही केंद्र का उर्वरक सब्सिडी खर्च 1.14 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुका था।
अल नीनो ने बढ़ाई मौसम की चिंता, खेती और पानी पर पड़ सकता है दबाव
अब इसमें मौसम की चुनौती जुड़ गई है। WMO के मुताबिक मौजूदा अल नीनो बहुत मजबूत हो सकता है और 2026 के अंत के आसपास इसकी तीव्रता चरम पर पहुंच सकती है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर देश में एक जैसा सूखा पड़ेगा, लेकिन बारिश और तापमान के सामान्य पैटर्न में बड़ा बदलाव होने का खतरा जरूर बढ़ जाता है। भारत के लिए यह इसलिए अहम है क्योंकि खेती का बड़ा हिस्सा मानसून पर निर्भर है। बारिश कम या अनियमित होने पर मिट्टी में नमी घटती है, जलाशयों में पानी कम हो सकता है और सिंचाई की लागत बढ़ सकती है। इसका असर धान, मक्का, गन्ना, कपास और दूसरी खरीफ फसलों के बाद गेहूं, चना और सरसों जैसी रबी फसलों पर भी पड़ सकता है।
सरकार ने भी मौसम से जुड़े जोखिम को देखते हुए 2026-27 के लिए खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य घटाकर 373.93 मिलियन टन किया है। सरकार ने बताया है कि यह लक्ष्य पानी की उपलब्धता और मिट्टी की नमी जैसे हालात को ध्यान में रखकर तय किया गया है। साथ ही रबी सीजन के लिए 163 लाख मीट्रिक टन का शुरुआती उर्वरक स्टॉक बताया गया है। इससे साफ है कि भारत में फिलहाल चुनौती को केवल खाद की कमी के रूप में नहीं देखा जा रहा। पानी, मौसम, बीज, खाद, ऊर्जा और परिवहन, ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
आम आदमी की जेब पर कैसे पड़ेगा असर
अगर वैश्विक स्तर पर अनाज का उत्पादन या सप्लाई घटती है तो सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसके बाद आयातित खाद्य तेल, अनाज और दूसरे कृषि उत्पाद महंगे हो सकते हैं। घरेलू बाजार में भी फसल खराब होने पर सब्जियों, दालों, अनाज और खाद्य तेलों की कीमत बढ़ने का जोखिम रहता है। महंगाई बढ़ने का असर सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं रहता। किसान की लागत बढ़ती है तो उत्पादन महंगा होता है। खाद और डीजल महंगा होने पर खेत की लागत बढ़ती है, परिवहन महंगा होने पर मंडी से शहर तक सामान पहुंचाने का खर्च बढ़ता है और अंत में इसका असर उपभोक्ता की जेब पर दिखाई देता है। अगर खाद्यान्न और ऊर्जा की कीमतों में लंबे समय तक तेजी रहती है तो सरकार को किसानों और उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। वहीं भारतीय रिजर्व बैंक के लिए भी महंगाई को नियंत्रित रखना चुनौती बन सकता है।
फिलहाल इसे भारत में निश्चित तौर पर आने वाले किसी बड़े खाद्य संकट के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। लेकिन संकेत जरूर ऐसे हैं जिन पर सरकारों और किसानों को नजर रखनी होगी। काला सागर में अनाज की सप्लाई, होर्मुज और दूसरे समुद्री मार्गों की स्थिति, उर्वरक की उपलब्धता और अल नीनो से बदलता मौसम, इन चारों का असर आने वाले महीनों में तय करेगा कि खाद्य बाजार पर दबाव कितना बढ़ता है। सबसे बड़ी राहत यह है कि भारत ने उर्वरक आपूर्ति के लिए वैकल्पिक स्रोत बढ़ाए हैं और सरकार ने रबी सीजन के लिए पर्याप्त शुरुआती स्टॉक होने की बात कही है। लेकिन वैश्विक संकट लंबा खिंचता है तो खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए भंडारण, आयात, सब्सिडी, सिंचाई और किसानों तक समय पर खाद पहुंचाने की व्यवस्था की अहमियत और बढ़ जाएगी।



