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Pawan Thakur, Rudra Ranjeet
जब पहली बार पिता ने अपने नवजात बच्चे को देखा, तो खुशी से ज्यादा आंखों में खौफ और बेबसी तैर गई थी। वजन सिर्फ 730 ग्राम, यानी हथेली पर उठा लो तो भी वजन न महसूस हो। शरीर इतना कोमल कि छूते हुए भी रूह कांप जाए। ऊपर से कुदरत का ऐसा इम्तिहान कि सांस लेने और घूंट भरने की नलियां ही आपस में उलझी हुई थीं। डॉक्टरों ने भी साफ कह दिया था कि राह बेहद पथरीली है और जान जाने का जोखिम हर कदम पर है। पर एक मां की ममता और पिता के हौसले ने हार मानने से इनकार कर दिया। उसी अटूट भरोसे और डॉक्टरों की चार महीने की दिन-रात की तपस्या का नतीजा है कि आज वह नन्हा बच्चा मौत के मुंह से हंसता-खेलता बाहर निकल आया है।

सांसों की डोर पतली थी और इम्तिहान बहुत कड़ा
यह कहानी सिर्फ एक मेडिकल ट्रीटमेंट की नहीं, बल्कि एक मासूम की उस अदम्य जिजीविषा की है, जिसने दुनिया में आते ही मौत को चुनौती दे दी। गर्भ के सिर्फ 28वें हफ्ते में अचानक पानी की थैली फटने के कारण जुड़वां बच्चों की डिलीवरी लक्ष्मी नर्सिंग होम में करानी पड़ी। जब यह बच्चा पैदा हुआ, तो सांसें उखड़ी हुई थीं। जांच में पता चला कि भोजन की नली अधूरी बनी थी और सांस की नली से जुड़ गई थी। मतलब, दूध की एक बूंद भी फेफड़ों में जाकर जान ले सकती थी। ऐसे नाजुक और कम वजन वाले बच्चे का ऑपरेशन करना आग के दरिया में उतरने जैसा था। पर पीडियाट्रिक सर्जन डॉ. मो. इमरान ने जन्म के दूसरे ही दिन यह बड़ा जोखिम उठाया और ऑपरेशन थिएटर में घंटों मशक्कत करके दोनों नलियों को अलग कर सही जगह जोड़ा।
हथेली पर समा जाने वाले 730 ग्राम के नन्हे फरिश्ते ने जीती सांसों की जंग
रांची के रानी हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने जन्म के दूसरे दिन भोजन नली की जटिल सर्जरी कर और 126 दिनों तक NICU में सघन देखभाल देकर मासूम को नई जिंदगी दी।#RanchiNews #Jharkhand #RaniHospital #MiracleBaby pic.twitter.com/RceLBjEAmm
— News Samvad (@newssamvaad) October 2, 2026
एनआईसीयू के कांच के पार आंसुओं और उम्मीदों का पहरा
सर्जरी तो कामयाब हो गई, लेकिन असली परीक्षा इसके बाद शुरू हुई। बच्चा खुद से सांस लेने लायक भी नहीं था। लगातार 25 दिनों तक वह मशीन के सहारे सांस लेता रहा और अगले 35 दिनों तक चेहरे पर मास्क लगाकर ऑक्सीजन दी गई। एनआईसीयू के कांच के बाहर खड़े माता-पिता की हर एक धड़कन मॉनिटर पर चलने वाली बीप के साथ ऊपर-नीचे होती थी। संक्रमण का खतरा इतना था कि वे अपने बच्चे को जी भर कर सीने से भी नहीं लगा सकते थे। इस पूरे दौर में डॉ. राजेश कुमार, डॉ. किरण और डॉ. शुभा की देखरेख वाली मेडिकल टीम ने सिर्फ डॉक्टर बनकर नहीं, बल्कि अभिभावक बनकर उस नन्हीं जान को संभाला। नर्सें एक-एक मिलीग्राम दवा और दूध की माप पर पहरा देती रहीं, ताकि कोई चूक न हो जाए।

126 दिनों बाद गोद में आई खुशियां
पूरे चार महीने से ज्यादा, यानी 126 दिनों तक चले इस लंबे संघर्ष के बाद जब बच्चे का वजन बढ़कर 1540 ग्राम हो गया, तो एनआईसीयू के दरवाजे खुले। जिस बच्चे को देखने भर से कलेजा कांपता था, आज जब मां ने उसे पहली बार बिना किसी नली और मशीन के अपनी गोद में समेटा, तो उनके आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। अस्पताल की निदेशक डॉ. सोनी सिन्हा का कहना है कि यह जीत डॉक्टरों की तकनीक के साथ-साथ माता-पिता के उस भरोसे की है, जो उन्होंने बदहवासी के पलों में भी नहीं खोया। आज जब यह बच्चा घर लौट रहा है, तो वह अपने साथ न सिर्फ नई जिंदगी लेकर जा रहा है, बल्कि उन तमाम मां-बाप के लिए एक उम्मीद भी छोड़ गया है जो वक्त से पहले जन्मे अपने बच्चों की जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
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