अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :
Pawan Thakur, Ranchi
किसी भी डॉक्टर की असली पहचान सिर्फ उसके क्लिनिक की चमक-दमक या डिग्री की लंबी कतार से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि मरीज उनके पास से कितना सुकून लेकर लौटता है। रांची के जाने-माने पेट और आंत रोग विशेषज्ञ यानी गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ जयंत कुमार घोष को करीब से जानने वाले लोग इस बात को अच्छी तरह समझते हैं। जब नई दिल्ली के यशोभूमि में आयोजित वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी 2026 में उन्हें ‘फेलो ऑफ इंडियन सोसाइटी ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी’ का राष्ट्रीय सम्मान मिला, तो झारखंड के चिकित्सा जगत ने गर्व से सिर ऊंचा किया। पूरे देश से गिने-चुने डॉक्टरों को यह उपाधि मिली, और झारखंड के खाते में यह सम्मान पहली बार दर्ज हुआ। लेकिन इस बड़े मुकाम के पीछे बरसों की शांत मेहनत, मरीजों के लिए फिक्र और सीखने की कभी न खत्म होने वाली ललक छिपी है।

बड़े अस्पताल से लेकर सरकारी ओपीडी तक बराबर संवेदना
डॉ जयंत घोष की सबसे बड़ी खूबी उनका सहज और मानवीय नजरिया है। वे इस समय रांची के प्रतिष्ठित ऑर्किड हेरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी में गंभीर मरीजों का इलाज करते हैं, जहां अत्याधुनिक मशीनें और तकनीक मौजूद हैं। पर उनकी दिनचर्या यहीं तक सीमित नहीं रहती। वे सदर अस्पताल, रांची के सरकारी वार्डों में भी उतने ही ध्यान से मरीजों को देखते हैं। आयुष्मान भारत योजना के तहत आने वाले गरीब और लाचार मरीजों को जब बड़े डॉक्टरों की सलाह नहीं मिल पाती, तब डॉ घोष उनके लिए बड़ा सहारा बनते हैं। उनके लिए यह मायने नहीं रखता कि सामने बैठा इंसान अमीर है या दूर किसी गांव से आया मजदूर, वे हर किसी की तकलीफ पूरी तसल्ली से सुनते हैं और यही बात उन्हें मरीजों का चहेता बनाती है।

झारखंड में पेट के इलाज की तस्वीर बदलने की जिद
एक वक्त था जब पेट, लिवर या आंत से जुड़ी थोड़ी भी पेचीदा बीमारी होने पर झारखंड के लोगों को कोलकाता, दिल्ली, हैदराबाद या वेल्लोर की टिकट कटवानी पड़ती थी। डॉ घोष ने इस मजबूरी को चुनौती की तरह लिया। उन्होंने राज्य के भीतर ही आधुनिक गैस्ट्रोएंटरोलॉजी को मजबूत करने का बीड़ा उठाया और नई तकनीकों को रांची लाकर मरीजों का भरोसा जीता। उनकी कोशिशों की बदौलत आज कई जटिल एंडोस्कोपी और पेट के गंभीर रोगों का इलाज राजधानी में ही मुमकिन हो चुका है। वे अपने युवा डॉक्टरों और सहयोगियों को भी लगातार प्रेरित करते हैं ताकि राज्य का हर कोना बेहतर इलाज से जुड़ सके।

नोबेल विजेता से मुलाकात और नई खोज की चाह
चिकित्सा के शिखर पर पहुंचने के बाद भी डॉ. जयंत घोष खुद को हमेशा एक छात्र मानते हैं। नई दिल्ली के इसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में उन्हें चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर बैरी मार्शल से मिलने और वैज्ञानिक चर्चा करने का मौका मिला। प्रोफेसर मार्शल वही वैज्ञानिक हैं जिन्होंने दुनिया को बताया था कि पेट के अल्सर और कैंसर के पीछे हेलिकोबैक्टर पाइलोरी बैक्टीरिया होता है। भारत के 25 चुनिंदा विशेषज्ञों के साथ बैठकर डॉ. घोष ने गैस्ट्राइटिस और पेट के कैंसर से जुड़ी रिसर्च पर बात की। यह दिखाता है कि वे केवल दवा लिखने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बीमारी की जड़ तक जाकर अपने राज्य के लोगों को सबसे आधुनिक इलाज देने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। उनकी यह यात्रा बताती है कि जब काम में समर्पण हो, तो सफलता खुद ब खुद कदम चूमती है।
इसे भी पढ़ें : रांची के मशहूर डॉ जयंत घोष का बैंकॉक में बजा डंका, मरीजों के लिए बने नई उम्मीद



