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Mumbai : याद कीजिए वो दिन जब पहाड़ों की घुमावदार सड़कों पर जाते ही मोबाइल स्क्रीन पर ‘नो सर्विस’ लिखकर आ जाता था। सीमा की आखिरी चौकी पर तैनात जवान को घर बात करने के लिए ऊंची पहाड़ी की चोटी तलाशनी पड़ती थी, या फिर गहरे समंदर में जाने वाले मछुआरों का दुनिया से नाता ही टूट जाता था। जमीन पर मोबाइल टावर और जमीन के नीचे ऑप्टिकल फाइबर बिछाकर देश को डिजिटल बनाने के बाद अब टेलीकॉम की दुनिया एक नए मोड़ पर खड़ी है। दिल्ली के प्रगति मैदान में सजे इंडिया मोबाइल कांग्रेस 2026 के मंच से रिलायंस जियो ने साफ कर दिया है कि जहां टावर की सीमा खत्म होती है, वहां से अंतरिक्ष का रास्ता शुरू होता है। कंपनी ने करीब 1,600 सैटेलाइट और देश भर में 23 ग्राउंड स्टेशन तैयार करने का एक ऐसा मेगा प्लान पेश किया है, जो आने वाले दिनों में हर भारतीय की जेब तक आसमान से सीधे सिग्नल पहुंचाएगा।
टावर नहीं, सीधे बादलों के पार से आएगा सिग्नल
जियो के इस पूरे मॉडल की सबसे दिलचस्प बात है इसका लो अर्थ ऑर्बिट यानी एलईओ सैटेलाइट नेटवर्क। आसान शब्दों में समझें तो ये छोटे सैटेलाइट धरती से ज्यादा ऊंचाई पर नहीं बल्कि निचली कक्षा में चक्कर काटेंगे। जमीन से कम दूरी होने की वजह से सिग्नल भेजने और वापस पाने में पलक झपकने जितना वक्त भी नहीं लगेगा। इसका सबसे बड़ा फायदा ‘डायरेक्ट टू डिवाइस’ कॉलिंग के तौर पर सामने आएगा। यानी सुदूर ग्रामीण इलाकों में फोन पर बात करने के लिए आपके आसपास किसी लोहे के ऊंचे टावर की जरूरत नहीं होगी, आपका फोन सीधे ऊपर घूम रहे सैटेलाइट से जुड़ जाएगा। यह तकनीक उन इलाकों के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगी जहां बिजली का खंभा तक नहीं पहुंचा है, टावर लगाना तो बहुत दूर की कौड़ी है।
पूरी कमान अपने हाथ, डिजाइन से लेकर लॉन्च तक स्वदेशी सोच
कंपनी ने इस प्रोजेक्ट को नाम दिया है सॉवरेन सैटेलाइट कनेक्टिविटी। इसका सीधा और सरल मतलब है अपनी संप्रभुता और आत्मनिर्भरता। आमतौर पर सैटेलाइट नेटवर्क के लिए विदेशी कंपनियों या बाहरी तकनीकों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे डेटा सुरक्षा का जोखिम रहता है। जियो का विजन इस पूरी कड़ी को देश के भीतर ही रखने का है। सैटेलाइट की डिजाइनिंग और इंजीनियरिंग से लेकर उनकी टेस्टिंग, अंतरिक्ष में लॉन्च और जमीन से उनके संचालन तक का पूरा पहिया भारत के अंदर ही घूमेगा। देश के अलग-अलग हिस्सों में बनने वाले 23 ग्राउंड स्टेशन एक मजबूत पुल की तरह काम करेंगे, जो अंतरिक्ष के इन 1,600 उपग्रहों को जियो के मौजूदा जमीनी नेटवर्क से रियल-टाइम में जोड़कर रखेंगे।
सिर्फ फोन पर बात नहीं, आपदा और सुरक्षा का नया सुरक्षा कवच
यह तैयारी सिर्फ सोशल मीडिया स्क्रॉल करने या यूट्यूब वीडियो देखने भर की नहीं है, बल्कि देश की हिफाजत और आपातकालीन जरूरतों का एक मजबूत ढांचा है। जब बाढ़, तूफान या भूकंप जैसी कोई प्राकृतिक आपदा आती है, तो सबसे पहले जमीन के खंभे और फाइबर केबल उखड़ते हैं। ऐसे नाजुक वक्त में जब पूरी व्यवस्था ठप हो जाती है, यह अंतरिक्ष नेटवर्क राहत और बचाव दलों के लिए जीवनरेखा बनेगा। इसके अलावा सीमावर्ती चौकियों पर मुस्तैद सुरक्षा बल, गहरे समुद्र में गश्त लगाती नौसेना, और बीच हवा में उड़ते यात्री विमान बिना किसी बाधा के देश के मुख्य नेटवर्क से जुड़े रहेंगे। छह लाख से ज्यादा गांवों, जंगलों और द्वीपों को जोड़कर देश के सौ फीसदी इलाके को एक डिजिटल धागे में पिरोने का यह सपना अब सिर्फ कागजी नहीं, बल्कि हकीकत की तरफ कदम बढ़ाता दिख रहा है।
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