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Garhwa (Nityanand Dubey) : गढ़वा के आरकेसीएम स्कूल ऑफ एक्सीलेंस का शनिवार कुछ अलग था। सामान्य दिनों की तरह यह दिन सिर्फ पढ़ाई का नहीं था, बल्कि समझ और जागरूकता का था। स्कूल के प्रांगण में छात्रों की आंखों में जिज्ञासा थी। कानून शब्द उनके लिए अब किताबों तक सीमित नहीं रह गया था, बल्कि उनकी अपनी ज़िंदगी से जुड़ता दिख रहा था।
न्याय की बात बच्चों तक
यह आयोजन सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के निर्देश, तथा झारखंड हाई कोर्ट की झालसा (JHALSA) की पहल पर हुआ। मकसद साफ था… बच्चों तक न्याय की भाषा को सरल रूप में पहुंचाना। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह-अध्यक्ष, डीएलएसए (DLSA) गढ़वा, मनोज प्रसाद और सचिव निभा रंजन लकड़ा की देखरेख में यह शिविर सिर्फ कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सामाजिक संदेश बन गया।
संविधान हमारे लिए क्या करता है?… बच्चों के मन में उठा सवाल
मुख्य वक्ता नित्यानंद दुबे ने जब मंच से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 की बात की, तो बच्चों की आंखें टिकी रहीं। उन्होंने समझाया कि यह अनुच्छेद हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। उन्होंने कहा कि राज्य का कर्तव्य है कि 6 से 14 वर्ष तक हर बच्चे को निःशुल्क शिक्षा मिले। यह सिर्फ कानून नहीं, आपका हक़ है। कई छात्राओं के चेहरे पर आत्मविश्वास झलक रहा था, मानो पहली बार उन्हें एहसास हुआ हो कि कानून उनके पक्ष में खड़ा है।
पॉक्सो कानून की सीख
मुख्य अतिथि प्रवीन्द साहू ने बच्चों को पॉक्सो (POCSO) अधिनियम की गंभीरता समझाई। उन्होंने बिना डराए, लेकिन सटीक शब्दों में बताया कि यह कानून बच्चों को हर तरह के यौन शोषण से सुरक्षा देता है। उन्होंने कहा कि गलती किसी की भी हो, कानून में हर बच्चे की सुरक्षा सर्वोपरि है। अगर कुछ गलत दिखे या महसूस हो, तो चुप न रहें, बोलें, बताएं। उनके शब्दों में वह भरोसा था, जो किसी समाज की सबसे मजबूत नींव बन सकता है… सुरक्षा की समझ।

एक नई समझ के साथ लौटे छात्र
कार्यक्रम के अंत में स्कूल की प्रधानाचार्या शिल्पी कुमारी ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। मंच से उतरते वक्त बच्चों के चेहरे पर वही जिज्ञासा नहीं थी जो शुरुआत में थी। अब वहां समझ और आत्मविश्वास झलक रहा था। किसी ने अपने दोस्त से कहा कि अब पता चला, ये सब हमारे लिए है… तो किसी ने धीरे से कहा, “अब कोई डर नहीं।”
लम्बे समय तक रहेगा असर
DLSA के PLV रविन्द्र कुमार यादव, तृप्ता भानु, स्कूल स्टाफ और शिक्षकगण की मौजूदगी में यह शिविर समाप्त हुआ, लेकिन इसका असर लंबे समय तक रहेगा। गढ़वा के इस छोटे से शहर में कानून ने आज बच्चों के दिल में अपनी जगह बना ली… न डराने वाली, बल्कि समझाने वाली भूमिका में।
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