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Ranchi : रांची की ठंडी रातें इन दिनों कुछ ज्यादा चुभ रही हैं। सड़क किनारे, रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर या किसी फुटपाथ के कोने में सिकुड़कर बैठे लोग शायद ही जानते हों कि रात कब गहराती है और ठंड कब असहनीय हो जाती है। ऐसे ही लोगों के बीच शनिवार की शाम एक टीम पहुंची, हाथों में कंबल लिए और मन में सिर्फ एक इरादा… किसी को भी सर्दी की रात अकेले नहीं छोड़ना। यह टीम JHALSA यानी झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और DLSA यानी जिला विधिक सेवा प्राधिकरण रांची की थी। अभियान की अगुवाई झालसा की सदस्य सचिव कुमारी रंजन आस्थाना, उप सचिव अभिषेक कुमार, रांची डालसा के सचिव रवि कुमार भास्कर और रेलवे मजिस्ट्रेट विजय कुमार यादव कर रहे थे। निर्देश न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद के थे, लेकिन असली प्रेरणा उन चेहरों में छुपी थी जिनकी रातें वर्षों से ऐसे ही गुजरती रही हैं।
सड़क किनारे ठिठुरते चेहरे, और एक राहत की परत
रांची रेलवे स्टेशन के बाहर एक बुजुर्ग फटी चादर में लिपटा मिला। हाथ ठंड से कांप रहे थे, आंखों में ठंड से ज्यादा असुरक्षा का भाव था। टीम ने उसे कंबल ओढ़ाया तो चेहरे की झुर्रियों में एक हल्की सी मुस्कान तैर गई। उसने होले से अपनी भाषा में कहा… आज राते बेस होके सुतबौउ (आज रात चैन से सो पाऊंगा)। ऐसे कई लोग मिले, कुछ अपने परिवार से बिछड़े हुए, कुछ काम की तलाश में आए और फुटपाथ पर टिक गए, और कुछ तो बस भाग्य से हारकर सड़कों पर रह गए। कंबल उनके लिए सिर्फ गर्म कपड़ा नहीं, एक आश्वासन था कि कोई है जो उन्हें देख रहा है।
जहां ठहरने की जगह नहीं, वहां टीम ने थामा हाथ
कई लोगों के पास सिर्फ कंबल देने से काम नहीं चल पाता। उनके पास कोई जगह ही नहीं थी। ऐसे लोगों को टीम ने तुरंत नजदीकी रैन बसेरों तक पहुंचाया। किसी को स्टेशन रोड के शेल्टर में छोड़ा गया, किसी को मेन रोड स्थित आश्रय गृह तक ले जाया गया। नाइट शेल्टर की सुविधा और सुरक्षा के बारे में भी बताया गया, ताकि वे आगे भी ठंड से बच सकें।
सेवा से आगे बढ़कर एक रिश्ते जैसा अभियान
अधिकारियों ने कहा कि यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संवेदना से जुड़ा काम है। JHALSA हर साल ठंड में ऐसा अभियान चलाता है, लेकिन इस बार कड़ाके की ठंड को देखते हुए खास तैयारी की गई है। पूरी टीम रात में लगातार निगरानी करेगी, ताकि कोई भी व्यक्ति ठंड की वजह से जोखिम में न पड़े।
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