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News Samvad : जोहान्सबर्ग में 22–23 नवंबर 2025 को हुआ G-20 समिट इतिहास में दर्ज हो गया। पहली बार ऐसा हुआ जब अफ्रीका की धरती पर बैठी दुनिया की सबसे शक्तिशाली टेबल ने अमेरिका और यूरोप की पुरानी दादागिरी को खुलकर चुनौती दी। भारत की अध्यक्षता के दौरान जिस बदलाव की शुरुआत हुई थी, उसी को दक्षिण अफ्रीका ने आगे बढ़ाया। अफ्रीकन यूनियन की सदस्यता से ग्लोबल साउथ की आवाज पहले से कहीं मजबूत होकर उभरी।
महाशक्तियों को चेतावनी: विस्तारवाद बंद करो
दुनिया में चल रहे युद्ध, कब्जे और परमाणु धमकियों पर G-20 देशों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। यह साफ संदेश था कि किसी भी देश की जमीन पर बलपूर्वक कब्जा अब स्वीकार नहीं किया जाएगा। सूडान, यूक्रेन और गाजा हिंसा पर गहरी चिंता जताई गई।
आर्थिक स्वतंत्रता: कर्ज के जाल के खिलाफ बगावत
IMF और विश्व बैंक के पुराने ढांचे को चुनौती देते हुए विकासशील देशों ने कर्ज की शर्तों में पारदर्शिता की मांग की। प्राइवेट क्रेडिटर्स पर भी अब नियम सख्त होंगे। अफ्रीका को IMF में 25वीं सीट मिलना इस बदलाव का बड़ा संकेत है।
खनिजों पर अब स्थानीय देशों का अधिकार
लिथियम और कोबाल्ट जैसे कीमती खनिजों पर पश्चिम की निर्भरता उजागर हुई। G-20 में तय हुआ कि अब खनिजों की प्रोसेसिंग अफ्रीका और एशिया में ही होगी, जिससे रोजगार स्थानीय स्तर पर बढ़ेंगे।
ऊर्जा और जलवायु पर कड़ा रुख
“मिशन 300” के जरिए 2030 तक 30 करोड़ अफ्रीकियों को बिजली देने का लक्ष्य रखा गया है। जलवायु फंडिंग के लिए अमीर देशों पर दबाव बढ़ाया गया है कि वे “बिलियंस से ट्रिलियंस” तक वित्त उपलब्ध कराएं।
संयुक्त राष्ट्र सुधार की जोरदार मांग
UN सुरक्षा परिषद में अफ्रीका और एशिया को प्रतिनिधित्व देने की मांग ने विश्व राजनीति में नया अध्याय खोल दिया है।
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