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Ramgarh (Dharmendra Pradhan) : सुबह के करीब सात बजे हैं। हल्की ठंड के बीच स्कूल यूनिफॉर्म पहने बच्चे अपने बैग टांगे घर से निकलते हैं। चेहरे पर पढ़ाई का उत्साह तो है, लेकिन कदम संभल-संभल कर पड़ रहे हैं। वजह… सड़क पर बहता नाली का गंदा और बदबूदार पानी। यह दृश्य भुरकुंडा के सुंदरनगर पंचायत के कई वार्डों की रोज की कहानी बन चुका है। जहां एक तरफ करोड़ों रुपये खर्च कर लोग आलीशान मकान बनाकर अपनी हैसियत दिखा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ घर के सामने की नाली की बदहाली समाज की सच्चाई बयां कर रही है।
“मम्मी, जूते फिर गंदे हो गए…”
तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली 9 साल की पायल (बदला हुआ नाम) रोज स्कूल जाते समय अपनी मां से यही शिकायत करती है… “मम्मी, जूते फिर गंदे हो गए…” उसकी मां बताती हैं, “बच्चे सुबह नहा-धोकर तैयार होते हैं, लेकिन घर से निकलते ही गंदा पानी सड़क पर फैला रहता है। कई बार तो बच्चे फिसल भी जाते हैं।” ये सिर्फ पायल की कहानी नहीं, बल्कि दर्जनों बच्चों की रोजमर्रा की परेशानी है। वे पढ़ने तो जा रहे हैं, लेकिन रास्ते की गंदगी उनके आत्मविश्वास और सेहत दोनों को प्रभावित कर रही है।

घर चमचमाते, बाहर गंदगी का अंबार
सुंदरनगर में कई मकान दूर से देखने पर किसी पॉश कॉलोनी का अहसास कराते हैं। ऊंची दीवारें, रंगीन पेंट, आकर्षक गेट… सब कुछ सलीकेदार। लेकिन जैसे ही नजर घर के सामने की नाली पर पड़ती है, तस्वीर बदल जाती है। नाली कचरे से भरी हुई है। प्लास्टिक, घर का कूड़ा, सब्जियों के छिलके-सब कुछ उसी में डाल दिया जाता है। लोग कचरा डालकर ऊपर से बाल्टी भर पानी उड़ेल देते हैं, ताकि कूड़ा आगे बढ़ जाए। लेकिन हकीकत में नाली जाम हो जाती है और गंदा पानी सड़क पर फैल जाता है।
बीमारी का डर, पर जागरूकता की कमी
स्थानीय बुजुर्ग रमेश प्रसाद कहते हैं, “गंदगी से मच्छर बढ़ रहे हैं। डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा रहता है। लेकिन लोग समझने को तैयार नहीं हैं।” डॉक्टरों की मानें तो गंदे पानी के लगातार संपर्क में रहने से त्वचा रोग और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। खासकर बच्चों की सेहत पर इसका बुरा असर पड़ सकता है।

नाली पर कब्जा, फिर झगड़ा
कई जगहों पर लोग मकान बनाते समय नाली पर ही ईंट, बालू और कंक्रीट गिरा देते हैं। नाली धीरे-धीरे ढंक जाती है और पानी का रास्ता बंद हो जाता है। अगर कोई पड़ोसी टोके तो बात समझाने से ज्यादा झगड़े तक पहुंच जाती है। एक स्थानीय महिला कहती हैं कि भाईचारा खत्म हो रहा है, लोग अपनी गलती मानने के बजाय लड़ाई पर उतर आते हैं।
पंचायत की जिम्मेदारी और समाज की भूमिका
सवाल सिर्फ प्रशासन का नहीं है, बल्कि समाज की सोच का भी है। पंचायत स्तर पर नियमित सफाई व्यवस्था की कमी जरूर है, लेकिन क्या नागरिकों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? गंदगी के लिए सिर्फ सिस्टम को दोष देना आसान है, लेकिन घर के सामने की नाली साफ रखना हर परिवार का भी कर्तव्य है।
उम्मीद की एक किरण
कुछ युवाओं ने मिलकर मोहल्ले में सफाई अभियान शुरू करने की बात उठाई है। उनका कहना है कि अगर हर घर से हफ्ते में एक दिन नाली की सफाई की जाए और कचरा अलग से जमा किया जाए, तो हालात बदल सकते हैं। “बच्चों के लिए तो हमें सोचना ही होगा,” एक युवा कहते हैं, “अगर आज हम नहीं सुधरे, तो आने वाली पीढ़ी भी यही सीखेगी।”
आखिर सवाल हमसे है…
सुंदरनगर की कहानी सिर्फ एक पंचायत की नहीं, बल्कि उस सोच की है जहां हम अपने घर के अंदर तो सफाई रखते हैं, लेकिन बाहर की जिम्मेदारी भूल जाते हैं। जब तक लोग यह नहीं समझेंगे कि सड़क और नाली भी उतनी ही अपनी है जितना घर का आंगन, तब तक बदलाव मुश्किल है।
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