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Ranchi : रांची की सुबह आम दिनों जैसी ही थी, लेकिन कांके रोड स्थित मुख्यमंत्री आवास में सीएम हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई एक बैठक ने 23 परिवारों की जिंदगी बदल दी। झारखंड राज्य सजा पुनरीक्षण परिषद की 36वीं बैठक में आजीवन कारावास की सजा काट रहे 23 कैदियों की रिहाई पर सहमति बनी। यह सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं था, बल्कि उन लोगों के लिए उम्मीद की किरण थी जो सालों से जेल की सलाखों के पीछे अपनी गलतियों, हालात और किस्मत के बीच जीवन काट रहे थे।
इंतजार की लंबी रातों के बाद आई सुबह
जेल की दीवारें सिर्फ कैदियों को नहीं रोकतीं, वे उनके परिवारों को भी बांध देती हैं। किसी बूढ़ी मां की आंखें हर त्योहार पर नम होती हैं। किसी पत्नी ने बच्चों को यह कहकर बड़ा किया कि “पापा काम से बाहर गए हैं।” किसी बेटे ने पिता को आखिरी बार तब देखा था, जब वह खुद बच्चा था। अब इन 23 घरों में शायद फिर से चूल्हा उसी उम्मीद से जलेगा, जैसे कभी जलता था।
कानून की कसौटी पर परखा गया हर मामला
बैठक की अध्यक्षता सीएम हेमंत सोरेन ने की। फैसले से पहले हर केस को बारीकी से देखा गया।
- अपराध की प्रकृति क्या थी
- अदालत की राय क्या रही
- संबंधित जिलों के पुलिस अधीक्षकों की रिपोर्ट
- जेल अधीक्षकों और प्रोबेशन अधिकारियों की अनुशंसा
- सामाजिक सुरक्षा और कारा नियमों की स्थिति
यानि यह फैसला भावनाओं में नहीं, बल्कि कानून और सामाजिक जिम्मेदारी के संतुलन पर लिया गया। 34 मामलों की समीक्षा हुई, लेकिन 23 को ही मंजूरी मिली। इसका मतलब साफ है… रिहाई एक अधिकार नहीं, बल्कि व्यवहार और परिस्थितियों के आधार पर दिया गया अवसर है।

सलाखों के पीछे बदलती जिंदगी
जेल सिर्फ सजा की जगह नहीं होती, वह आत्ममंथन की जगह भी बन जाती है। कई कैदी जेल में रहकर पढ़ाई करते हैं, कुछ कारीगरी सीखते हैं, कुछ धार्मिक या सामाजिक गतिविधियों से जुड़ते हैं। सूत्रों के मुताबिक, जिन कैदियों को रिहाई की सहमति मिली है, उनमें कई ने जेल में रहते हुए अच्छा आचरण दिखाया और सुधारात्मक कार्यक्रमों में भाग लिया। यही बदलाव उनके लिए आज एक नई राह लेकर आया है।
डायन-बिसाही जैसे मामलों पर संवेदनशील पहल
बैठक में उन मामलों पर भी चर्चा हुई जो डायन-बिसाही (जादू-टोना के आरोप) से जुड़े रहे हैं। झारखंड के कई ग्रामीण इलाकों में यह सामाजिक कुरीति आज भी मौजूद है। निर्देश दिया गया कि महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाया जाए, ताकि भविष्य में ऐसे आरोपों के कारण किसी की जिंदगी बर्बाद न हो। यह पहल सिर्फ रिहाई नहीं, बल्कि समाज को बदलने की कोशिश भी है।
रिहाई के बाद क्या
अक्सर सबसे बड़ी चुनौती जेल से बाहर आने के बाद शुरू होती है।
समाज में स्वीकार्यता, रोज़गार, सम्मान… ये सब आसान नहीं होता।
इसीलिए मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया है कि:
- रिहा कैदियों का व्यवस्थित डेटाबेस तैयार किया जाए
- उन्हें सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ा जाए
- आय सृजन के अवसर दिए जाएं
- जिला स्तर पर समन्वयक उनकी निगरानी और मदद सुनिश्चित करें
सरकार की कोशिश है कि ये लोग दोबारा अपराध की दुनिया में न लौटें, बल्कि सम्मानजनक जीवन जिएं।
एक फैसला, कई कहानियां
इन 23 नामों के पीछे 23 कहानियां हैं… गलतियां, पछतावा, सजा और अब शायद सुधार की शुरुआत। यह सच है कि अपराध का दर्द कभी मिटता नहीं, पीड़ित परिवारों का जख्म भी बना रहता है। लेकिन कानून का एक चेहरा सुधार का भी होता है।
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