अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :
Ranchi/Saraikela : झारखंड की धरती पर कभी लाल आतंक का खौफ ऐसा था कि सूरज ढलते ही जंगलों की तरफ जाने वाली सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता था। गोलियों की तड़तड़ाहट और आईईडी के धमाके आम बात हुआ करते थे। लेकिन आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। सरायकेला-खरसावां के दुर्गम जंगलों में सुरक्षाबलों ने जो सर्जिकल स्ट्राइक की है, उसने माओवादियों के बचे-कुचे हौसलों को भी पस्त कर दिया है। 22 लाख रुपये के इनामी तीन हार्डकोर नक्सलियों की गिरफ्तारी सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि इस बात का सबूत है कि झारखंड की वादियों से नक्सलवाद का दौर अब अपने आखिरी दिन गिन रहा है।
सालों से खौफ का पर्याय बने तीन इनामी हत्थे चढ़े
सुरक्षाबलों के हत्थे चढ़े इन तीनों नक्सलियों का चेहरा माओवादी संगठन में बड़ा मायने रखता था। इनमें सबसे बड़ा नाम 15 लाख रुपये के इनामी मदन महतो उर्फ शंकर का है। पश्चिम बंगाल के मिदनापुर से ताल्लुक रखने वाला मदन सालों से दलमा और कोल्हान के जंगलों में अपनी समानांतर सरकार चला रहा था। उसके साथ गिरफ्तार हुई उसकी पत्नी मीना, जिस पर 2 लाख का इनाम था, संगठन की सबसे बड़ी नेटवर्क मैनेजर थी। रसद से लेकर हथियारों को गुप्त ठिकानों तक पहुंचाना और दस्तों की आवाजाही का जिम्मा उसी के कंधों पर था। वहीं तीसरा चेहरा 5 लाख का इनामी रवि सरदार था, जो रीजनल कमेटी के कमांडर के तौर पर जंगलों में जवानों के लिए बारूदी सुरंगें बिछाने का काम करता था। इन तीनों का पकड़ा जाना माओवादियों के ढाँचे पर सबसे करारी चोट माना जा रहा है।
असीम मंडल के किले में लगी सेंध, तीन एके-47जब्त
गिरफ्तारी के बाद जब जवानों ने इनके ठिकाने की तलाशी ली, तो वहां से तीन एके-47 राइफलें, सैकड़ों जिंदा गोलियां और बम बनाने का सामान बरामद हुआ। ये तीनों नक्सली एक करोड़ रुपये के इनामी शीर्ष माओवादी असीम मंडल उर्फ आकाश के सबसे भरोसेमंद प्यादे थे। हाल के दिनों में सुरक्षा बलों ने जिस तरह मिसिर बेसरा के नेटवर्क को ध्वस्त किया था, ठीक वैसे ही इस बार असीम मंडल के सबसे मजबूत किले में सेंध लगा दी गई है। यह वही दस्ता था जो जंगलों में नए लड़कों का ब्रेनवॉश करके उन्हें हथियार थमाता था और व्यापारियों से लेवी वसूल कर संगठन की तिजोरी भरता था।
अंधेरी रात, पक्की मुखबरी और सटीक घेराबंदी
सुरक्षा एजेंसियों को गुप्त सूचना मिली थी कि सरायकेला के घने जंगलों में माओवादियों की एक गुप्त बैठक होने वाली है, जहां किसी बड़े हमले का ताना-बाना बुना जा रहा है। खबर पक्की होते ही झारखंड पुलिस और सीआरपीएफ की एक जॉइंट टीम तैयार की गई। रात के अंधेरे में जवानों ने बिना कोई आहट किए पूरे जंगल को चारों तरफ से सील कर दिया। जैसे ही जवानों की आहट पाकर नक्सलियों ने भागने की कोशिश की, सुरक्षाबलों के अभेद्य घेरे ने उनके सारे रास्ते बंद कर दिए। बिना एक भी गोली चलाए तीनों खूंखार नक्सलियों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया गया।
DGP तदाशा मिश्र, IG साकेत सिंह और IG नरेंद्र कुमार सिंह की त्रिमूर्ति ने बदली तस्वीर
झारखंड में नक्सलियों के खिलाफ मिल रही इस ऐतिहासिक और अभूतपूर्व सफलता के पीछे राज्य के तीन शीर्ष अधिकारियों का दिमाग काम कर रहा है। DGP तदाशा मिश्र के पद संभालते ही पुलिस बल का मनोबल और काम करने का तरीका पूरी तरह बदल गया है। उनकी दूरदर्शी रणनीति, सख्त तेवर और इंटेलिजेंस-बेस्ड अभियानों ने नक्सलियों को बचाव की मुद्रा में ला खड़ा किया है।
इस मुहिम में सीआरपीएफ के आईजी साकेत सिंह की भूमिका भी बेहद अहम रही है। उनके कुशल मार्गदर्शन में केंद्रीय बलों ने नक्सलियों के उन गढ़ों में अपनी पैठ बनाई है, जहां कभी आम इंसान कदम रखने से भी डरता था। वहीं आईजी अभियान नरेंद्र कुमार सिंह की अचूक रणनीति, सटीक तालमेल और ग्राउंड लेवल पर ऑपरेशन्स की लगातार मॉनिटरिंग ने नक्सलियों की हर चाल को नाकाम कर दिया है। इन तीनों अधिकारियों की मजबूत जुगलबंदी और जमीनी समन्वय का ही नतीजा है कि आज झारखंड में लाल आतंक का सूरज हमेशा-हमेशा के लिए ढलने की कगार पर खड़ा है।
इसे भी पढ़ें : बंदूक का गुरूर खत्म, हाथों में मुख्यधारा की पतवार… झारखंड में 16 खूंखार नक्सलियों ने डाला हथियार











