अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :
Ramgarh (Dharmendra Pradhan) : रात-दिन एक करके, हाड़-कंपाने वाली ठंड और झुलसाने वाली गर्मी में जो किसान पूरे देश का पेट भरता है, आज वही अपनी किस्मत पर आंसू बहाने को मजबूर है। देश के अन्नदाता सालभर खेतों में खून-पसीना बहाते हैं, लेकिन जब कमाई का वक्त आता है, तो असली मुनाफा उनकी जेब में जाने के बजाय बिचौलियों के खातों में पहुंच जाता है। धान, गेहूं से लेकर हरी सब्जियों तक, हर फसल को उगाने वाला किसान आज भी अपनी मेहनत की सही कीमत पाने के लिए दर-दर भटक रहा है।
बीज से लेकर बाजार तक सिर्फ संघर्ष
एक किसान की कहानी सिर्फ फसल बेचने से शुरू नहीं होती। खेत को तैयार करने से लेकर, महंगे दाम पर बीज खरीदना, समय पर सिंचाई करना, खाद और कीटनाशकों का इंतजाम करना और फिर दिन-रात जंगली जानवरों व मौसम से फसल की रखवाली करना, यह सब उसकी दिनचर्या का हिस्सा है। मौसम की बेरुखी, लगातार बढ़ती लागत और कभी सूखा तो कभी बाढ़ जैसी आपदाओं का सारा जोखिम अकेले किसान ही उठाता है। महीनों की इस कमरतोड़ मेहनत के बाद जब खेत लहलहाते हैं, तब कहीं जाकर किसान की आंखों में दो वक्त की रोटी और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की उम्मीद जगती है।

मजबूरी का फायदा उठाते बिचौलिये
परेशानी तब शुरू होती है जब फसल कटकर तैयार हो जाती है। हमारे देश के ज्यादातर छोटे और मझोले किसानों के पास इतने पैसे नहीं होते कि वे अपनी फसल को रोककर रख सकें। कर्ज चुकाने और घर के खर्चे चलाने के चक्कर में वे अपनी उपज को तुरंत बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
इसके ऊपर से, गांवों में न तो फसलों को सुरक्षित रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था है और न ही मंडियों तक जाने के लिए सस्ते साधन। इसी लाचारी का फायदा बिचौलिये उठाते हैं। वे किसानों से औने-पौने दाम पर धान, गेहूं, टमाटर, आलू, गोभी और मिर्च जैसी फसलें खरीद लेते हैं। हैरानी की बात यह है कि यही सब्जियां और अनाज जब शहरों की मंडियों और दुकानों तक पहुंचते हैं, तो इनकी कीमतें कई गुना बढ़ जाती हैं।
किसान भी परेशान और ग्राहक भी बेहाल
इस पूरी व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इसमें मेहनत करने वाले किसान को उसकी लागत तक नहीं मिल पाती, और दूसरी तरफ शहर में रहने वाला आम उपभोक्ता (ग्राहक) उसी सामान को आसमान छूती कीमतों पर खरीदने के लिए मजबूर है। मेहनत किसान की, जेब ढीली जनता की, और मलाई काट रहे हैं बीच के चंद लोग। इस खेल के कारण किसान आज भी वहीं का वहीं खड़ा है, जहां वह सालों पहले था।
कैसे सुधरेगी अन्नदाता की हालत?
खेती-किसानी से जुड़े जानकारों का साफ कहना है कि जब तक इस व्यवस्था की कमियों को दूर नहीं किया जाएगा, हालात नहीं बदलेंगे। सरकार और प्रशासन को कुछ बड़े कदम उठाने होंगे…
- किसानों को सीधे बाजार और बड़े खरीदारों से जोड़ने के लिए पुख्ता इंतजाम करने होंगे।
- हर इलाके में सरकारी या कम किराए वाले कोल्ड स्टोरेज बनाने होंगे ताकि सब्जियां सड़ने के डर से किसान उन्हें सस्ते में न बेचें।
- गांवों से मंडियों तक फसल पहुंचाने के लिए सस्ती और सुलभ परिवहन गाड़ियां उपलब्ध करानी होंगी।
- सरकारी खरीद केंद्रों पर पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए ताकि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का पूरा लाभ मिल सके।
आखिरकार, जिस किसान की बदौलत हर रोज हमारे और आपके घर की थाली सजती है, उसे अपनी मेहनत का हक और न्यायपूर्ण मूल्य मिलना ही चाहिए। अगर अन्नदाता कमजोर रहेगा, तो देश कभी मजबूत नहीं हो सकता।
इसे भी पढ़ें : रथ खींचने उमड़ा जनसैलाब, ‘जय जगन्नाथ’ के जयकारों से गूंज उठा रामगढ़

