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Pakur (Jaydev Kumar) : कभी कालाजार की त्रासदी से जूझता छोटा-सा जिला आज पूरे देश के लिए उम्मीद और प्रेरणा का प्रतीक बन गया है। राष्ट्रीय कालाजार वर्कशॉप में जब पाकुड़ के डीसी मनीष कुमार ने जिले का कालाजार उन्मूलन मॉडल प्रस्तुत किया, तो सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। विशेषज्ञ खड़े होकर तालियां बजाते रहे… यह सिर्फ एक प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि वर्षों की जमीनी मेहनत और सामूहिक जज्बे की दास्तान थी।
संघर्ष से सफलता तक
कुछ वर्ष पहले तक पाकुड़ जिले के गांव-गांव कालाजार की दहशत फैली हुई थी। गरीब और वंचित तबके की ज़िंदगी बीमारी के बोझ तले कराह रही थी। लेकिन प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और आम लोगों ने मिलकर ठान लिया कि इस बीमारी को जड़ से उखाड़ फेंकना है। गांव-गांव जागरूकता अभियान, घर-घर दवा पहुंचाने की व्यवस्था, और समय पर इलाज ने धीरे-धीरे हालात बदल डाले।
राष्ट्रीय मंच पर चमका पाकुड़
वर्कशॉप के “Best Practices from Field in Kala-azar” सत्र में डीसी मनीष कुमार ने आंकड़ों के साथ बताया कि कैसे सामुदायिक भागीदारी ने इस अभियान को सफल बनाया। हर गांव में स्वास्थ्यकर्मियों की तैनाती, डोर-टू-डोर सर्वे और जनजागरूकता रैलियों ने इस लड़ाई को लोगों का अपना आंदोलन बना दिया।
कविता ने छू लिया दिल
प्रस्तुति के अंत में डीसी ने अपनी लिखी कविता सुनाई, जो पाकुड़ की संघर्षयात्रा और संकल्प को दर्शाती थी। कविता सुनते ही पूरा सभागार भावविभोर हो उठा। सभी ने मिलकर संकल्प लिया… “कालाजार को जड़ से मिटाकर रहेंगे, पाकुड़ की तरह हर जिला इस अभियान में विजयी बनेगा।”
“अभी नहीं तो कभी नहीं”
पाकुड़ के इस मॉडल ने न केवल बीमारी से लड़ने का तरीका बताया, बल्कि एक नारा भी दिया… “अभी नहीं तो कभी नहीं।”
यह नारा सिर्फ कालाजार उन्मूलन के लिए नहीं, बल्कि हर उस चुनौती के लिए संदेश है, जो समाज और प्रशासन मिलकर हल कर सकते हैं।
गर्व का पल, प्रेरणा की मिसाल
यह क्षण सिर्फ पाकुड़ के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का था। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकुड़ का मॉडल आने वाले समय में कालाजार मुक्त भारत की नींव साबित होगा।
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