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Ranchi : सड़क पर निकलते वक्त कौन सोचता है कि अगला मोड़ जिंदगी बदल देगा। एक पल की चूक, एक झटका, और फिर अस्पताल की भागदौड़, पुलिस थाना, कागजों का ढेर, इलाज का खर्च और घर में पसरा सन्नाटा। सड़क दुर्घटना सिर्फ एक घटना नहीं होती, यह उस परिवार की दुनिया हिला देती है, जो अपने कमाने वाले हाथ या अपने बच्चे को खो देता है। इसी दर्द और इसी सच्चाई को सामने रखते हुए व्यवहार न्यायालय, रांची के 40 कोर्ट भवन स्थित कॉन्फ्रेंस हॉल में मोटर वाहन दुर्घटना एवं बीमा क्लेम को लेकर जिला स्तरीय एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार (झालसा) के निर्देश पर और जिला विधिक सेवा प्राधिकार, रांची के मार्गदर्शन में हुआ।
दीप जला, लेकिन चर्चा उन जिंदगियों की थी जो हादसे में बुझ जाती हैं
कार्यशाला की शुरुआत दीप प्रज्वलन के साथ हुई। मंच संचालन एलएडीसी सदस्य स्वीकृति विनाया ने किया। स्वागत भाषण और धन्यवाद ज्ञापन डालसा सचिव राकेश रौशन ने दिया। कार्यक्रम में न्यायायुक्त अनिल कुमार मिश्रा-1, रांची जिला बार एसोसिएशन के महासचिव संजय कुमार विद्रोही, पीओ एमएसीटी निशांत कुमार, रूरल एसपी प्रवीण पुष्कर, डीएसपी अमर कुमार पांडेय, डीएसपी ट्रैफिक प्रमोद कुमार केशरी, रिम्स ट्रॉमा सेंटर के एचओडी प्रदीप कुमार भट्टाचार्य, अधिवक्ता, न्यायिक पदाधिकारी, पीएलवी और कई अधिकारी मौजूद रहे।

“पीड़ित परिवार के पास कोई बताने वाला नहीं होता”
कार्यशाला में सबसे अहम बात कही न्यायायुक्त अनिल कुमार मिश्रा-1 ने। उन्होंने सीधे शब्दों में कहा कि सड़क दुर्घटना के बाद सबसे ज्यादा परेशान वही परिवार होता है जिसके घर में हादसा हुआ है। उन्होंने कहा कि पीड़ित परिवार के पास कोई रिसोर्स पर्सन नहीं होता, कोई ऐसा नहीं जो सही रास्ता बताए। इसी कारण कई बार मुआवजा मिलने में महीनों नहीं, सालों लग जाते हैं। उनका कहना था कि इस कार्यशाला का उद्देश्य यही है कि पुलिस, वकील, डॉक्टर और न्यायालय से जुड़े सभी लोग एक ही दिशा में काम करें, ताकि पीड़ित परिवारों को समय पर राहत मिल सके।
सड़क हादसा केवल चोट नहीं, घर की रीढ़ टूट जाती है
रांची जिला बार एसोसिएशन के महासचिव संजय कुमार विद्रोही ने भावुक होते हुए कहा कि एमएसीटी को केवल कानूनी नजरिए से देखना गलत है। उन्होंने कहा कि सड़क दुर्घटना सिर्फ एक केस नहीं, एक घर का भविष्य बिगाड़ देती है। बच्चे की पढ़ाई रुक जाती है, घर का खर्च रुक जाता है, इलाज का बोझ बढ़ जाता है और परिवार अंदर से टूट जाता है। उन्होंने साफ कहा कि मुआवजा दया का विषय नहीं, यह अधिकार का विषय है। उन्होंने धारा 164 और 166 पर भी चर्चा की और बताया कि किस तरह पीड़ित पक्ष अपना दावा प्रस्तुत कर सकता है।
“बॉर्डर से ज्यादा मौतें सड़क पर होती हैं”
रूरल एसपी प्रवीण पुष्कर ने जो बात कही, उसने हॉल में मौजूद लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने कहा कि जितनी मौतें बॉर्डर पर नहीं होतीं, उससे ज्यादा मौतें सड़क दुर्घटनाओं में हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि दुर्घटना के बाद जांच और दस्तावेजी प्रक्रिया समय पर पूरी हो जाए, तो पीड़ित परिवार को न्याय और मुआवजा जल्दी मिल सकता है।
48 घंटे की देरी, पीड़ित परिवार पर भारी पड़ जाती है
कार्यशाला में तकनीकी और जरूरी जानकारी दी पीओ एमएसीटी निशांत कुमार ने। उन्होंने बताया कि सड़क दुर्घटना केस में सबसे बड़ी समस्या समय पर रिपोर्टिंग और डॉक्यूमेंटेशन की होती है। उन्होंने कहा कि कानून में यह प्रावधान है कि दुर्घटना के 48 घंटे के भीतर अनुसंधानकर्ता को फर्स्ट एक्सीडेंट रिपोर्ट (एफएआर) क्लेम ट्रिब्यूनल में जमा करनी होती है। इतना ही नहीं, एफएआर की एक प्रति पीड़ित परिवार, इंश्योरेंस कंपनी और झालसा को देना भी जरूरी है।
90 दिनों के भीतर डीएआर जरूरी, तभी मुआवजा समय पर
पीओ एमएसीटी ने बताया कि डिटेल एक्सीडेंट रिपोर्ट (डीएआर) भी 90 दिनों के भीतर जमा करना जरूरी है। इस रिपोर्ट की प्रति पीड़ित, क्लेमेंट, चालक, वाहन मालिक, इंश्योरेंस कंपनी और झालसा को भी देना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि जब तक ये कागज पूरे नहीं होंगे, तब तक केस आगे नहीं बढ़ेगा और मुआवजा भी लटकता रहेगा।
बदलाव हुए हैं, नियम सख्त हुए हैं
पीओ एमएसीटी ने यह भी बताया कि झारखंड मोटर दुर्घटना कानूनों में 2019 और 2022 में बदलाव हुए हैं। इसके तहत दुर्घटना की सूचना तय समय में न्यायाधिकरण तक पहुंचाना अनिवार्य कर दिया गया है। उनका कहना था कि नियम साफ हैं, अब जरूरत है कि सभी संबंधित विभाग जिम्मेदारी के साथ उनका पालन करें।
पुलिस की भूमिका सबसे अहम, क्योंकि शुरुआत वहीं से होती है
डीएसपी हेडक्वार्टर-1 अमर कुमार पांडेय और डीएसपी ट्रैफिक प्रमोद कुमार केशरी ने एमएसीटी मामलों में अनुसंधान की बारीकियों पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि दुर्घटना के बाद पुलिस द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट ही पूरे मामले की नींव होती है। अगर शुरुआत में गलती हो गई तो पीड़ित को मुआवजा पाने में लंबा संघर्ष करना पड़ता है।
अस्पताल की इमरजेंसी में जिंदगी बचती है, लेकिन संघर्ष वहीं से शुरू होता है
कार्यशाला में रिम्स ट्रॉमा सेंटर के एचओडी प्रदीप कुमार भट्टाचार्य की मौजूदगी ने इस चर्चा को और मानवीय बना दिया। क्योंकि सड़क दुर्घटना के बाद पहला ठिकाना अक्सर अस्पताल ही होता है। वहां डॉक्टर जान बचाने में जुटते हैं और बाहर परिवार इलाज का खर्च, कागज, पुलिस और भविष्य की चिंता में टूटता रहता है।
कोर्ट में केस कैसे चले, यह भी बताया गया
रांची जिला बार एसोसिएशन के अधिवक्ता अरविंद लाल ने बताया कि एमएसीटी मामलों को कोर्ट में किस तरह प्रस्तुत किया जाता है और कौन-कौन से दस्तावेज जरूरी होते हैं। उन्होंने कहा कि सही तरीके से केस कंडक्ट हो, तो पीड़ित परिवार को अनावश्यक परेशानी नहीं झेलनी पड़ेगी।
पीड़ित की नजर से सोचने की जरूरत
कार्यशाला में एक बात बार-बार उभरकर सामने आई कि दुर्घटना के बाद पीड़ित परिवार का सबसे बड़ा दर्द यह होता है कि वह अकेला पड़ जाता है। थाने के चक्कर, अस्पताल का खर्च, कागजों की दौड़, वकीलों की फीस और इंश्योरेंस की शर्तें, इन सबके बीच परिवार सिर्फ यही चाहता है कि उसे समय पर न्याय मिल जाए।
“सतर्क रहिए, सड़क पर हर पल कीमती है”
कार्यशाला का संदेश साफ था कि दुर्घटना होने के बाद मुआवजा दिलाना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है दुर्घटना से बचाव। न्यायायुक्त ने कहा कि सड़क दुर्घटना समय देखकर नहीं आती। इसलिए सतर्क रहना ही सबसे बड़ा बचाव है।
अंत में सचिव ने जताया आभार
कार्यक्रम के अंत में डालसा सचिव राकेश रौशन ने धन्यवाद ज्ञापन किया और कहा कि इस तरह की कार्यशालाएं लोगों को जागरूक करने के लिए जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि अगर सभी स्टेकहोल्डर्स समय पर काम करें तो सड़क दुर्घटना पीड़ितों को समय पर मुआवजा और न्याय मिल सकता है।
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