अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :
Ranchi (Pawan Thakur) : कभी-कभी जिंदगी इतनी बेरहम हो जाती है कि बचपन के हाथों में किताब की जगह शादी का कार्ड थमा दिया जाता है। उम्र जब गुड़ियों से खेलने और स्कूल की घंटी सुनने की होती है, तब किसी मासूम को ससुराल की चौखट पर खड़ा कर दिया जाता है। रांची जिले के पिठोरिया की रहने वाली 13 साल की एक बच्ची के साथ भी कुछ ऐसा ही होने जा रहा था।
घर की गरीबी और मजबूरी ने उसके मां-बाप को इस हद तक धकेल दिया कि उन्होंने अपनी नन्ही बेटी की शादी एक 45 वर्षीय अधेड़ व्यक्ति से तय कर दी। लेकिन किस्मत ने शायद अभी उसके लिए कुछ और लिखा था। बाल विवाह के इस पिंजरे से उसे बाहर निकालने के लिए समय रहते जिला विधिक सेवा प्राधिकार (डालसा), रांची की टीम सामने आई और एक मासूम की जिंदगी बदल गई।
जब बचपन पर भारी पड़ गई गरीबी
पिठोरिया की रहने वाली यह बच्ची बेहद गरीब परिवार से आती है। घर की हालत ऐसी थी कि रोज की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो गया था। माता-पिता के पास न तो स्थायी काम था, न ही कोई सहारा। ऐसे में बच्ची का पालन-पोषण उनके लिए बोझ बनता जा रहा था। इसी मजबूरी के बीच उन्होंने एक ऐसा फैसला कर लिया, जिसने बच्ची के पूरे बचपन को निगलने की तैयारी कर ली थी। बच्ची की शादी उत्तर प्रदेश के रहने वाले 45 वर्षीय व्यक्ति से तय कर दी गई। शादी की तारीख भी तय हो चुकी थी। 31 मार्च को बात पक्की हो गई थी। घर वालों को लग रहा था कि बेटी की शादी हो जाएगी तो जिम्मेदारी खत्म हो जाएगी। लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा कि 13 साल की बच्ची के लिए यह शादी नहीं, एक सजा है।
मासूम ने खुद को बचाने के लिए उठाया सबसे बड़ा कदम
बच्ची के लिए यह सब समझना मुश्किल नहीं था। वह जानती थी कि शादी का मतलब क्या होता है। उसे पता था कि अगर वह उस घर में चली गई, तो किताबें छूट जाएंगी, स्कूल छूट जाएगा, और उसकी जिंदगी वहीं खत्म हो जाएगी। वह रोई होगी, गिड़गिड़ाई होगी, मना की होगी। लेकिन जब घर में कोई सुनने वाला नहीं मिला, तो उसने वही किया जो एक कमजोर बच्ची के बस में था… वह घर से भाग गई।
छोटी उम्र, डर, भूख, अनजान रास्ते और अनजान लोग… फिर भी वह अकेली निकल पड़ी। वह किसी को कुछ बताए बिना बुण्डू पहुंच गई। शायद उसे खुद भी नहीं पता था कि आगे क्या होगा, बस इतना तय था कि उसे शादी नहीं करनी।
बुण्डू में एक नजर ने बचा ली जिंदगी
बुण्डू में बच्ची अकेली थी। उसके चेहरे पर डर था और आंखों में थकान। वह किसी स्टेशन या सड़क किनारे बैठी थी। तभी वहां मौजूद एक पीएलवी (पैरा लीगल वॉलंटियर) की नजर उस पर पड़ी। पीएलवी ने बच्ची से बात की। उसके जवाब सुनते ही वे समझ गए कि मामला गंभीर है। उन्होंने बिना देरी किए डालसा सचिव राकेश रौशन को फोन कर सूचना दी। यही फोन कॉल बच्ची के लिए उम्मीद की पहली किरण बन गई।
डालसा सचिव ने खुद बच्ची से की बात
सूचना मिलते ही डालसा सचिव राकेश रौशन हरकत में आ गए। यह मामला केवल कानून का नहीं था, एक मासूम जिंदगी को बचाने का था। झालसा के कार्यपालक अध्यक्ष न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद के निर्देश पर तत्काल कार्रवाई शुरू हुई। यह पूरी पहल सदस्य सचिव झालसा कुमारी रंजना अस्थाना एवं रांची के न्यायायुक्त अनिल कुमार मिश्रा-1 के मार्गदर्शन में की गई। डालसा सचिव राकेश रौशन ने खुद बच्ची से बातचीत कर पूरी घटना की जानकारी ली। बच्ची ने बताया कि उसकी शादी तय कर दी गई है और वह शादी नहीं करना चाहती। वह पढ़ना चाहती है। उसकी बातों में डर भी था और उम्मीद भी।
टीम बनी और मौके पर पहुंच गई मदद
बिना समय गंवाए डालसा की टीम को बुण्डू भेजा गया। महिला थाना बुण्डू की एसआई बुलबुल कुमारी भी इस कार्रवाई में शामिल रहीं। डालसा की टीम में पीएलवी सोनामनी देवी, रूकमनी देवी, प्रदुमण प्रमाणिक, बिमला कुमारी और महिला आरक्षी सुमीला लकड़ा शामिल थीं। टीम ने बच्ची को रेस्क्यू किया। उस वक्त बच्ची को यह भरोसा दिलाया गया कि अब वह सुरक्षित है। अब कोई उसे जबरदस्ती शादी के लिए नहीं ले जाएगा।
प्रेमाश्रय में मिली राहत की सांस
रेस्क्यू के बाद चाईल्ड हेल्पलाइन की मदद से बच्ची को रांची स्थित प्रेमाश्रय में आवासित कराया गया। यह वह जगह है जहां उसे सुरक्षा भी मिलेगी और भविष्य की दिशा भी। प्रेमाश्रय पहुंचते ही बच्ची की आंखों में एक अलग चमक थी। शायद पहली बार उसे महसूस हुआ कि उसकी जिंदगी का फैसला अब कोई और नहीं करेगा।
“मैं पढ़ना चाहती हूं, सिलाई भी सीखना चाहती हूं”
जब बच्ची से पूछा गया कि वह क्या चाहती है, तो उसने बहुत साधारण लेकिन बेहद मजबूत शब्दों में कहा कि वह आगे पढ़ना चाहती है। वह स्कूल जाना चाहती है। साथ ही वह सिलाई सीखना चाहती है ताकि आगे चलकर अपने पैरों पर खड़ी हो सके। यह सुनकर टीम के लोग भी भावुक हो गए। डालसा ने भरोसा दिलाया कि डीसीपीयु से बात कर बच्ची के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था कराई जाएगी। साथ ही उसे आवासीय स्कूल में दाखिला भी दिलाया जाएगा ताकि उसका भविष्य सुरक्षित हो सके।
शादी तय कराने वाले पर भी होगी कार्रवाई
इस मामले में यह भी सामने आया कि बच्ची की शादी गोला के रहने वाले लुतेश कुमार महतो के द्वारा तय कराई गई थी। डालसा सचिव ने बुण्डू महिला थानेदार से बातचीत कर दोषी व्यक्तियों के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई करने को कहा है। डालसा का स्पष्ट कहना है कि बाल विवाह एक अपराध है और इसे कराने वाले या इसमें मदद करने वाले लोग कानून से नहीं बच सकते।
यह कहानी सिर्फ एक बच्ची की नहीं
यह घटना सिर्फ एक मासूम बच्ची की कहानी नहीं है। यह कहानी उन हजारों बच्चों की है जो गरीबी, मजबूरी और समाज के दबाव में हर दिन अपने बचपन से हाथ धो बैठते हैं। कई बार मां-बाप मजबूरी में गलत कदम उठा लेते हैं। लेकिन कानून और समाज का दायित्व है कि बच्चों की जिंदगी बचाई जाए। अगर समय रहते मदद नहीं मिले, तो ऐसी बच्चियां जिंदगी भर दर्द और घुटन में जीने को मजबूर हो जाती हैं।
डालसा ने बचाया बचपन
इस पूरे मामले में डालसा, रांची की त्वरित कार्रवाई ने यह साबित कर दिया कि अगर सिस्टम जाग जाए तो कोई भी बच्चा बाल विवाह के पिंजरे में नहीं फंस सकता। एक छोटी सी सूचना, एक संवेदनशील नजर और एक तेज कार्रवाई ने एक बच्ची की जिंदगी को अंधेरे से निकालकर रोशनी में ला दिया।
अब उम्मीद है कि गुड़िया फिर से सपने देखेगी
अब वह बच्ची प्रेमाश्रय में सुरक्षित है। अब उसके हाथों में फिर से किताबें होंगी। अब उसकी आंखों में शादी का डर नहीं, भविष्य की उम्मीद होगी। आज वह बच्ची एक बार फिर बचपन की तरफ लौट रही है।
इसे भी पढ़ें : खामोश डर टूटा, मुस्कान लौटी : डालसा की पहल से फिर खिली मासूमियत



