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Ranchi/Lohardaga : लोहरदगा के कुड़ू प्रखंड के छोटे से गांव सुकमार पंचायत सुन्दरू ओपा की मिट्टी आज भी उस घर की मजबूरी की गवाही दे रही है, जहां से दो मासूम बच्चियां रोज़ सुबह किताबें लेकर स्कूल जाने का सपना तो देखती हैं, लेकिन गरीबी और अभाव की हकीकत बार-बार उन्हें रोक देती है। सपना कुमारी (16) और नेहा कुमारी (10) की आंखों में भविष्य की चमक है, लेकिन उस चमक को पूरा करने वाला सहारा दो साल पहले ही टूट गया। पिता चेतू उरांव की मौत ने पूरे परिवार को निराशा की अंधेरी गली में धकेल दिया।
संघर्ष करती मां की ममता
घर की जिम्मेदारी अब सिर्फ मां प्रमिला उरांव के कंधों पर है। तीन बच्चों का लालन-पालन, उनके भोजन की व्यवस्था और शिक्षा का भार… सब कुछ प्रमिला को अकेले संभालना पड़ रहा है। खेत-खलिहान से लेकर दिहाड़ी मजदूरी तक, हर काम में वह जुटती हैं। लेकिन उनकी कमाई इतनी नहीं कि बच्चों की पढ़ाई और रोज़मर्रा का खर्च आराम से चल सके। कई बार तो दो वक्त का खाना जुटाना भी चुनौती बन जाता है।
आदरणीय उपायुक्त महोदय @DC_LOHARDAGA जी से पुनः निवेदन करता हु कि कृपया इस प्रकरण पर यथाशीघ्र संज्ञान लें 16 वर्षीय सपना कुमारी और 10 वर्षीय नेहा कुमारी आदिवासी छात्रा इनके सर से इनके पिता का साया विगत 2 वर्ष पहले चला गया लोहरदगा जिले के ग्राम सुकमार पंचायत सुन्दरू ओपा ब्लॉक कुड़ू… https://t.co/uz1YWEoDYU
— Beauty mandal (@MousamMandal9) September 24, 2025
सरकार से मदद की उम्मीद
प्रमिला की सबसे बड़ी चिंता उनकी बेटियों की पढ़ाई है। वे कहती हैं… मेरे पति नहीं रहे, लेकिन मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटियों के सपने भी टूट जाएं। सरकार से मेरी बस यही प्रार्थना है कि बच्चियों की पढ़ाई और भविष्य सुरक्षित करने में मदद मिले।
उनकी उम्मीद सरकार की उन योजनाओं पर टिकी है, जो गरीब और जरूरतमंद परिवारों के बच्चों को शिक्षा और आर्थिक सहायता देने के लिए चलाई जाती हैं।
ब्यूटी मंडल की ट्वीट पर DC ने लिया संज्ञान, जागी मदद की आस
प्रमिला की दर्द भरी दास्तां पर लोहरदगा की ही रहने वाली ब्यूटी मंडल तक पहुंची तो उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने तुरंत लोहरदगा के डीसी डॉ. कुमार ताराचंद को ट्वीट कर मामले का जानकारी दी। लोहरदगा के डीसी डॉ. कुमार ताराचंद ने मामले पर संज्ञान लेते हुए तत्काल आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया है। उन्होंने कहा कि परिवार को सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाएगा और बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो, इसके लिए प्रशासन हर संभव मदद करेगा।

इंसानियत की पुकार
यह कहानी सिर्फ प्रमिला और उनकी बेटियों की नहीं, बल्कि उन तमाम परिवारों की हकीकत है जो गरीबी और अभाव में भी सपनों को संजोए हुए हैं। सवाल यह है कि क्या समाज और सरकार मिलकर ऐसे परिवारों के सपनों को नया सहारा दे पाएंगे? फिलहाल लोहरदगा की इन बच्चियों के लिए उम्मीद का दीया जल चुका है, और गांव वाले भी चाहते हैं कि उनकी कहानी अधूरी न रहे।

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