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Ranchi : कमरे में बैठे अधिकारी सवाल पूछ रहे थे। सामने छोटे बच्चे चुपचाप बैठे थे। माहौल सामान्य था, लेकिन जवाब अंदर से हिला देने वाला। डालसा सचिव राकेश रौशन ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा, “बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?” बच्चे ने बिना झिझक कहा,
“बड़ा होकर भीख मांगना चाहता हूं… मम्मी-पापा को खिलाना है।” इसके बाद कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
जब सपने हालात से हार जाते हैं
यह कोई कहानी नहीं थी, बल्कि उस हकीकत का आईना था, जिसमें सड़क और गरीबी ही बच्चों का स्कूल बन जाती है। सहयोग विलेज आश्रय गृह में रेस्क्यू किए गए इन बच्चों के लिए भीख मांगना कोई अपराध नहीं, बल्कि परिवार को जिंदा रखने का जरिया रहा है। बच्चे ने यह भी कहा कि उसे भीख मांगना अच्छा लगता है। यह सुनकर साफ था कि समाज ने उसके सपनों की परिभाषा बहुत पहले तय कर दी थी।
डालसा टीम का आश्रय गृहों में दौरा
झालसा के न्यायामूर्ति सह कार्यपालक अध्यक्ष सुजित नारायण प्रसाद के निर्देश पर और सदस्य सचिव कुमारी रंजना अस्थाना एवं न्यायायुक्त रांची अनिल कुमार मिश्रा-1 के मार्गदर्शन में डालसा सचिव राकेश रौशन ने 22 जनवरी को प्रेमाश्रय, सहयोग विलेज और बालाश्रय का जायजा लिया। उनके साथ डिप्टी एलएडीसी राजेश कुमार सिन्हा और पीएलवी की टीम भी मौजूद थी। जायजा का मकसद सिर्फ व्यवस्थाओं को देखना नहीं था, बल्कि बच्चों की मनोदशा को समझना भी था।
“यहां सब ठीक है, लेकिन घर जाना है”
प्रेमाश्रय में रह रहे 13 रेस्क्यू बच्चों ने बताया कि खाने, रहने और सुरक्षा में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन उनका मन वहां नहीं लगता। एक बच्ची ने हौले से कहा, “घर जाना है… मम्मी-पापा के पास।” बच्ची के मुख से निकली यह बात बता गयी कि सुविधाएं बच्चों की भावनाओं का विकल्प नहीं बन सकती।
बालाश्रय में 21 बच्चों से सीधी बातचीत
इसके बाद डालसा टीम बालाश्रय पहुंची, जहां 21 रेस्क्यू बच्चों से बातचीत और काउंसलिंग की गई। बच्चों को मिलने वाले भोजन, पढ़ाई और अन्य सुविधाओं की जानकारी ली गई। डालसा सचिव राकेश रौशन ने स्पष्ट कहा कि बच्चों को केवल सुरक्षित रखना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्हें यह भी दिखाना जरूरी है कि उनका भविष्य भी हो सकता है।
शिक्षा और काउंसलिंग पर खास जोर
डालसा सचिव ने आश्रय गृह के प्रभारी को निर्देश दिया कि बच्चों के रहने की अवधि के दौरान उनकी नियमित पढ़ाई और मानसिक काउंसलिंग की समुचित व्यवस्था की जाए। उनका कहना था कि अगर समय रहते बच्चों को सही दिशा नहीं मिली, तो हालात ही उनके सपनों का रास्ता तय करते रहेंगे।
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